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15 वर्षों की उपेक्षा का सोनापुर की सड़कों से उठता सच

The People of West Bengal Are Angry : गुस्सा एक-दो दिन का नहीं है। यह किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि एक लंबी अवधि के दौरान एकत्रित थकान और हताशा का नतीजा है। 15 साल एक लंबा समय होता है। एक पीढ़ी पलट जाती है। अगर इतने लंबे समय तक जनता सत्ता को वोट देती है, विश्वास करती है, लेकिन उसे बदले में सिर्फ खोखले वादे मिलते हैं, तो उसका धैर्य टूटना लाजमी है।

जनता का गुस्सा: 15 वर्षों की उपेक्षा का प्रतिफल या बदलते समाज का संदेश? (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • सोनापुर की सड़कों से उठता सच
  • लोकतंत्र में जनता का अंतिम निर्णय
  • उपेक्षा की राजनीति का अंत
  • विकास के दावों पर जनता का सवाल
  • 15 वर्षों की पीड़ा का विस्फोट

West Bengal Politics: लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी दोनों ‘जनता’ ही है। ताकत इसलिए, क्योंकि उनके बिना कोई भी सत्ता कायम नहीं रह सकती और कमजोरी इसलिए, क्योंकि अक्सर उनके गुस्से को राजनीतिक दल अपने-अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर लेते हैं। लेकिन, जब यह गुस्सा किसी राजनीतिक दल के ‘हाथियों’ या ‘बैनरों’ से ऊपर उठकर सड़क पर खड़े एक आम नागरिक की आंखों में साफ दिखाई देता है, तो समझना पड़ता है कि मामला सिर्फ चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत है।

पश्चिम बंगाल के सोनापुर और आसपास के इलाकों में जो नजारा देखने को मिल रहा है, वह किसी भी तरह से ‘कृत्रिम’ या ‘प्रायोजित’ प्रतीत नहीं होता। स्थानीय लोगों का आक्रोष, उनके चेहरों पर तनाव और उनके नारे यह बताते हैं कि यह आग किसी ने नहीं लगाई, बल्कि यह 15 साल की उपेक्षा के चलते अपने आप भड़की है।

निराशा स्वाभाविक रूप से आक्रोष में

प्रदर्शनकारियों की मांगें कोई असाधारण या महत्वाकांक्षी नहीं हैं। वे सड़कों की मरम्मत, पीने के पानी की व्यवस्था और बुनियादी जीवन शैली की सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। ये वे अधिकार हैं जो किसी भी नागरिक को एक सुशासित राज्य में मिलने चाहिए। लेकिन जब एक स्थानीय व्यक्ति का मुंह से यह शब्द निकलता है कि ‘अभिषेक बनर्जी के पास 17 आलीशान मकान हैं, लेकिन हमारे पास पीने का पानी तक नहीं है’, तो यह वाक्य केवल एक आरोप नहीं है, बल्कि यह सत्ता और जनता के बीच बढ़ती खाई का दर्दनाक चित्रण है।

यह एक गंभीर सवाल खड़ा करता है—क्या लोकतंत्र का मतलब सिर्फ पांच साल में एक बार वोट मांगना है, या जनता के विश्वास पर शासन करना भी है? जब जनता देखती है कि उनके प्रतिनिधि आलीशान इमारतों और भव्य जीवनशैली में रह रहे हैं, जबकि उनके लिए एक गिलास साफ पानी मुहाल है, तो उनमें पैदा होने वाली निराशा किसी भी विपक्षी दल को उकसाने की जरूरत नहीं होती। यह निराशा स्वाभाविक है और स्वाभाविक रूप से आक्रोष में बदल जाती है।

यह गुस्सा एक-दो दिन का नहीं है। यह किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि एक लंबी अवधि के दौरान एकत्रित थकान और हताशा का नतीजा है। 15 साल एक लंबा समय होता है। एक पीढ़ी पलट जाती है। अगर इतने लंबे समय तक जनता सत्ता को वोट देती है, विश्वास करती है, लेकिन उसे बदले में सिर्फ खोखले वादे मिलते हैं, तो उसका धैर्य टूटना लाजमी है।

जनता विकास की आस लगाए बैठी है, उसे रोजी-रोटी चाहिए, उसके बच्चों को शिक्षा चाहिए और उसके परिवार को स्वास्थ्य सुविधाएं चाहिए। जब सत्ता के भव्य विकास के दावे जमीन पर उतरकर कचरे जैसे दिखाई देते हैं, तो भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और सत्ता का अहंकार जनता को सब्र करने पर मजबूर नहीं कर सकता। ऐसी स्थिति में जब जनता का फूटना स्वाभाविक है, तो उसे ‘विपक्ष की साजिश’ करार देना उनकी बुद्धिमत्ता का अपमान है।

सरकार को बनाया, लेकिन नहीं पाया

यह भीड़ केवल विपक्ष की भीड़ नहीं हो सकती। यह उस जनता की भीड़ है, जिसने सत्ता को वोट दिया, जिसने सरकार को अपना बनाया, लेकिन बदले में विकास नहीं पाया। यह एक खतरनाक संकेत है किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए। जब आपका अपना मतदाता आपके खिलाफ खड़ा हो जाए, तो समझो कि नींव ही कमजोर हो चुकी है।

पश्चिम बंगाल में जो हालात हैं, उनसे साफ प्रतीत होता है कि यह आक्रोष किसी एक पार्टी के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ है, जिसने उन्हें उपेक्षित महसूस कराया है। गरीब और आम जनता का गुस्सा तब फूटता है, जब वे सीमाओं से गुजर जाते हैं। जब भूख से परेशान आदमी को समझ में आता है कि उसका वोट सिर्फ सत्ता के लिए इस्तेमाल हुआ था, न कि उसके कल्याण के लिए, तो वह सड़क पर उतरने से नहीं हिचकता।

इतिहास गवाह है कि कोई भी ऐसी सरकार या व्यवस्था देर तक टिक नहीं पाती, जो सिर्फ दबदबे, प्रशासनिक नियंत्रण या दिखावे पर चलती हो। जब सरकार जनता की सुविधाएं प्रदान करने में नाकाम रहती है और केवल अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए ताकत का इस्तेमाल करती है, तो वह एक ऐसी गाड़ी की तरह होती है जिसके पहिए हवा में घूम रहे हों।

कुछ समय के लिए शायद इंजन का शोर सुनाई दे, लेकिन आगे बढ़ना असंभव हो जाता है। पश्चिम बंगाल में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। 15 साल तक चला दबदबा, जब चुनावी नतीजों के बाद ढहा, तो उसके नीचे दबी आम जनता की आवाज फूट पड़ी। यह विफलता केवल चुनाव हारने की नहीं है, बल्कि समाज के विश्वास को खोने की है।

इतिहास के कूड़ेदान में

देखें तो देश में ऐसे कई राज्य और क्षेत्र हैं, जहां स्थितियां बिगड़ने के कगार पर हैं। अगर आम जनता की सुविधाएं सुनिश्चित नहीं होतीं और सिर्फ विकास के झूठे सपने बेचे जाते हैं, तो लोकतंत्र का मतलब खत्म हो जाता है। पुराना इतिहास यही प्रदान करता है कि जो शासक जनता से जुड़ाव खो देता है, वह इतिहास के कूड़ेदान में समा जाता है।

फ्रांस की क्रांति से लेकर भारत के आपाद्विवस्त वादी आंदोलनों तक, हर क्रांति की जड़ में जनता का दमित गुस्सा होता है। आज का समाज वह समाज नहीं रहा जो पहले था। यह जागरूक, सचेत और सवाल पूछने वाला समाज है। वह समय चला गया जब सरकारें जनता को भोला-भाला मानकर उन्हें गुमराह कर सकती थीं। आज सूचना का युग है और जनता अब यह समझ चुकी है कि उसका असली विकास क्या होना चाहिए।

पश्चिम बंगाल के सोनापुर में जनता ने जो दृश्य प्रस्तुत किया है, वह भविष्य के लिए एक सीख है। यह बताता है कि आज का समाज जागता समाज है। जागरूकता की इस लहर ने अब जनता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उनका वोट, उनका समर्थन और उनका धैर्य मुफ्त नहीं है। वे अब यह तय करेंगे कि कौन उनके हित में है और कौन नहीं। राजनेताओं के 17 मकान उनके तक नहीं पहुंच सकते, लेकिन एक किलो अनाज या एक बाल्टी पानी का अभाव उनके घर को तोड़ सकता है। यह समीकरण अब सत्ता को समझना होगा।

संक्षेप में, सोनापुर का यह आंदोलन किसी एक राज्य या एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस पुरानी सोच के खिलाफ है जो जनता को केवल वोट बैंक मानती है। यह एक चेतावनी है कि अगर जनता की बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज किया गया, तो सत्ता के सिंहासन भी हिल जाते हैं। जनता का गुस्सा कृत्रिम नहीं है, यह 15 साल की पीड़ा का परिणाम है, और अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह सिर्फ सड़कों पर नहीं, बल्कि इतिहास के पन्नों में भी अपना गहरा निशान छोड़ जाएगा। आज का समाज पहले जैसा नहीं रहा, वह अब अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार है, और यही लोकतंत्र का सच्चा स्वरूप है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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