क्या कोई बिल्ली किसी मरीज की मौत का समय पहले से भांप सकती है? अमेरिका के रोड आइलैंड स्थित एक नर्सिंग होम में रहने वाली ऑस्कर बिल्ली की कहानी ने वर्षों तक डॉक्टरों, नर्सों और मरीजों के परिवारों को हैरान किया। स्टाफ के मुताबिक, जब ऑस्कर किसी गंभीर रूप से बीमार मरीज के बिस्तर पर जाकर बैठता, तो अक्सर कुछ ही घंटों में उस मरीज की मृत्यु हो जाती थी।
ऑस्कर की इस आदत को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई गईं। कुछ लोगों ने माना कि वह शरीर में होने वाले बदलावों की गंध पहचान लेता था, तो कुछ ने उसके व्यवहार को मरीजों के तापमान या उनकी हालत से जोड़कर देखा। हालांकि, ऑस्कर बिल्ली के बारे में अब तक कोई पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि वह मौत का सटीक समय बता सकती थी।
नर्सिंग होम में शुरू हुआ ऑस्कर का अनोखा व्यवहार
साल 2005 में अमेरिका के रोड आइलैंड के एक नर्सिंग होम ने ऑस्कर को गोद लिया था। यह काले-सफेद रंग का बिल्ला आमतौर पर शांत रहता था और लोगों से खास घुलता-मिलता नहीं था। लेकिन नर्सिंग स्टाफ ने जल्द ही उसके व्यवहार में एक असामान्य पैटर्न देखा।
ऑस्कर अक्सर उन मरीजों के कमरे में चला जाता, जिनकी हालत बेहद गंभीर होती थी। वह उनके बिस्तर पर चढ़कर शरीर के पास दुबक जाता और वहीं ठहरा रहता। स्टाफ के अनुसार, ऐसे कई मामलों में मरीज की मृत्यु कुछ घंटों के भीतर हो जाती थी। शुरुआत में इसे संयोग समझा गया, लेकिन कथित तौर पर ऐसा बार-बार होने के बाद नर्सों ने ऑस्कर के व्यवहार को गंभीरता से देखना शुरू किया।
इस कहानी का एक भावुक पहलू भी था। नर्सिंग होम में कई मरीज डिमेंशिया के अंतिम चरण में थे। कुछ के परिवार उनसे मिलने नहीं आ पाते थे और कई लोग जीवन के अंतिम समय में अकेले होते थे। ऐसे में ऑस्कर का उनके पास जाकर बैठना परिवारों और कर्मचारियों को सांत्वना देता था।
क्या ऑस्कर ने 100 से ज्यादा मौतों का संकेत दिया था?
ऑस्कर के बारे में चर्चित विवरणों के मुताबिक, नर्सिंग होम के कर्मचारियों ने समय के साथ उसके व्यवहार और मरीजों की हालत का मिलान करना शुरू किया। कई बार जब ऑस्कर किसी मरीज के पास बैठता, तो स्टाफ परिवार को फोन कर देता या डॉक्टरों को सूचित कर देता। इससे परिजनों को अपने प्रियजन के पास पहुंचने और उनसे विदा लेने का अवसर मिल सकता था।
मरीजों के परिवारों के लिए ऑस्कर का वहां होना हमेशा डर का संकेत नहीं था। कुछ लोगों को लगता था कि वह बीमार व्यक्ति के साथ चुपचाप रहकर उसे अकेला नहीं छोड़ रहा है। एक मरीज के रिश्तेदार ने बताया था कि ऑस्कर को अपनी मां के पास देखकर उन्हें लगा कि अब अंतिम विदाई का समय आ गया है। ऐसी प्रतिक्रियाएं इस कहानी को केवल रहस्य से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना से भी जोड़ती हैं।
हालांकि, ऑस्कर की कथित भविष्यवाणियों की संख्या और उनकी सटीकता को लेकर सावधानी जरूरी है। मीडिया और किताबों में 100 से अधिक मामलों का उल्लेख मिलता है, लेकिन इसे नियंत्रित वैज्ञानिक अध्ययन के नतीजे के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए। यह मुख्य रूप से नर्सिंग होम के स्टाफ के अनुभवों और रिपोर्ट किए गए मामलों पर आधारित कहानी है।
डॉ. डेविड डोसा और ‘मेकिंग राउंड्स विद ऑस्कर’
डॉक्टर डेविड डोसा ने 2007 में एक मेडिकल जर्नल में ऑस्कर के व्यवहार के बारे में लिखा था। बाद में उन्होंने इस अनुभव पर किताब ‘मेकिंग राउंड्स विद ऑस्कर’ भी लिखी। इस लेखन ने ऑस्कर की कहानी को व्यापक पहचान दिलाई और यह सवाल उठाया कि क्या जानवर इंसानों की बीमारी या जीवन के अंतिम चरण में होने वाले बदलावों को सूंघकर पहचान सकते हैं।
डोसा और नर्सिंग होम के कर्मचारियों के विवरणों के कारण ऑस्कर को अक्सर “मौत की भविष्यवाणी करने वाली बिल्ली” कहा गया। लेकिन यह उपाधि कहानी को आकर्षक बनाती है, वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं। ऑस्कर के व्यवहार पर कोई ऐसा निर्णायक अध्ययन सामने नहीं आया, जो साबित करे कि वह मृत्यु का समय जानता था।
मौत से पहले शरीर में होने वाले बदलाव: संभावित वजहें
मृत्यु के करीब पहुंच रहे व्यक्ति के शरीर में कई बदलाव हो सकते हैं। सांस लेने का तरीका बदल सकता है, शरीर का तापमान घट-बढ़ सकता है और चयापचय में परिवर्तन आ सकते हैं। इन बदलावों के साथ शरीर की गंध में भी अंतर संभव है। बिल्लियों की सूंघने की क्षमता इंसानों से बेहतर होती है, इसलिए कुछ विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया कि ऑस्कर ऐसे संकेत पहचान सकता था।
एक दूसरी संभावना यह है कि ऑस्कर मरीजों की शारीरिक गर्मी, सांस, हलचल या कमरे के माहौल में आए बदलावों पर प्रतिक्रिया देता हो। गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति कम हिलता-डुलता है और उसके आसपास देखभाल की गतिविधियां भी बढ़ जाती हैं। बिल्ली इन संकेतों को महसूस कर सकती है—लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि वह जानती थी कि मृत्यु कब होगी।
यह भी संभव है कि ऑस्कर उन मरीजों के पास इसलिए जाता हो क्योंकि वे शांत रहते थे या उनके कमरे का वातावरण उसे पसंद आता था। उसके व्यवहार को समझने के लिए नियंत्रित अध्ययन, तुलना समूह और व्यवस्थित रिकॉर्ड की जरूरत होती। केवल बार-बार हुई घटनाओं का वर्णन किसी कारण को प्रमाणित नहीं करता।



























