कागजों में स्वच्छता, गलियों में गंदगी

जब इस सर्वे के दौरान उत्तम नगर जिले के निवासियों से स्वच्छता को लेकर उनके अनुभव जानने की कोशिश की गई, तो लोगों का गुस्सा चरम सीमा पर था। यह गुस्सा किसी एक विभाग के प्रति नहीं था, बल्कि एक समग्र निराशा का रूप था।

उत्तम नगर में सरकारी दावों का रियलिटी चेक (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • सीवर की बदहाली से जनता त्रस्त
  • स्वच्छता के नाम पर उत्पीड़न का आरोप
  • उत्तम नगर में प्रशासन के खिलाफ बढ़ा आक्रोश
  • कूड़े से आजादी का दावा, जमीन पर बदहाली

Cleanliness on paper, filth in the streets: स्वतंत्रता दिवस का दिन किसी राष्ट्र के लिए केवल एक राष्ट्रीय पर्व नहीं होता, बल्कि यह एक ऐसा मौका होता है जब सरकारें और प्रशासन जनता के सामने अपनी उपलब्धियों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं। लेकिन, 15 अगस्त के इसी ऐतिहासिक दिन पर दिल्ली के उत्तम नगर के मोहन गार्डन जैसे जगहों पर किए गए एक स्वच्छता सर्वे ने एक ऐसी तस्वीर पेश की, जो पूरे देश की राजधानी में चल रही ‘विकास की कहानियों’ पर करारी चोट है। यह सर्वे किसी विपक्षी दल का नहीं था, बल्कि आम जनता से बातचीत पर आधारित एक मजबूत जनतंत्र का आईना था, जिसमें दिल्ली सरकार के स्वच्छता अभियानों की पोल खुलकर सामने आई। उत्तम नगर की गलियों और मोहल्लों में जिस तरह का असंतोष और गुस्सा देखने को मिला, वह किसी एक मुद्दे का नहीं था, बल्कि एक ऐसे व्यवस्थात्मक विफलता का प्रतीक था, जहां आम आदमी की परेशानियों को नजरअंदाज करके सिर्फ कागजों पर ‘स्वच्छ शहर’ का तमगा लगाया जा रहा है।

उबलता हुआ जनांदोलन: गलियों से निकली आवाज

जब इस सर्वे के दौरान उत्तम नगर जिले के निवासियों से स्वच्छता को लेकर उनके अनुभव जानने की कोशिश की गई, तो लोगों का गुस्सा चरम सीमा पर था। यह गुस्सा किसी एक विभाग के प्रति नहीं था, बल्कि एक समग्र निराशा का रूप था। लोगों ने तीन मुख्य मुद्दों पर चुभाने वाली बातें कहीं—गाड़ियों (वाहनों) को लेकर जारी उत्पीड़न, सीवर व्यवस्था की बदहाली, और पुलिस की चरम लापरवाही।

एक तरफ सरकारें टीवी के पर्दे और बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर ‘स्वच्छ दिल्ली’ के सपने दिखा रही हैं, दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह है कि एक आम नागरिक अपने ही घर से निकलने में डरता है। उत्तम नगर जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में पार्किंग की कोई व्यवस्था नहीं है। लोग अपनी जरूरत के काम आने वाली गाड़ियों को सड़क किनारे खड़ा करते हैं, ताकि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी चल सके। लेकिन यहां स्वच्छता और यातायात नियमों के नाम पर टो वाहन का डर सदैव बना रहता है। जनता का सवाल है कि जब आप हमें पार्किंग की बुनियादी सुविधा नहीं दे सकते, तो फिर गलियों में खड़ी गाड़ियों पर चलने वाला तानाशाही चालान अभियान क्यों? यह स्वच्छता नहीं, जनता की जेब काटने का एक और तरीका मालूम होता है।

सीवर की समस्या: स्वच्छता के असली दुश्मन

स्वच्छता की बात करने वाली सरकारों को यह समझना होगा कि सफाई का असली मतलब सिर्फ सड़कों पर झाड़ू लगाना या दीवारों पर पेंट करवाना नहीं है। उत्तम नगर में जो सबसे बड़ा मुद्दा सामने आया, वह था सीवर की बदहाली। बरसात के मौसम में, या फिर रोजमर्रा में भी सीवर का पानी सड़कों पर बहता दिखता है। यह पानी न केवल बदबूदार होता है, बल्कि संक्रामक बीमारियों का गढ़ बन जाता है। बच्चे और बुजुर्ग इस सीवर के पानी से गिरकर घायल होते हैं या फिर डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों के शिकार होते हैं।

जब जनता से इस पर सवाल पूछे गए, तो लोगों का कहना था कि शिकायत करने पर कोई सुनवाई नहीं होती। जल बोर्ड और नगर निगम आपस में ब्लेमगेम खेलते रहते हैं। एक विभाग दूसरे विभाग पर जिम्मेदारी थोपता है, लेकिन समस्या जस की तस बनी रहती है। सीवर लाइनों की सफाई तो दूर, उन्हें बदलने का काम ही नहीं हो रहा। जब आपके आस-पास का वातावरण ही सड़ांध से भरा हो, तब ‘स्वच्छ दिल्ली’ के नारे किस काम के? यही वजह है कि आम जनता का गुस्सा सही मायने में न्यायसंगत है।

कानून व्यवस्था का पहलवान बना कागज का सिंह

स्वच्छता और सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक ऐसा शहर जहां सुरक्षा का डर न हो, वहां स्वच्छता के अभियान सफल नहीं हो सकते। उत्तम नगर के लोगों ने पुलिस की लापरवाही को लेकर जो खुलासा किया, वह चौंकाने वाला है। जब लोगों को अवैध अतिक्रमण, खुले में शराब पीने वालों या सड़कों पर गंदगी फैलाने वालों की शिकायत लेकर जाते हैं, तो पुलिस उन्हें टरका देती है।

दिलचस्प बात यह है कि जहां एक तरफ पुलिस असली अपराधियों और गुंडों से नजरें नहीं मिलाती, वहीं दूसरी तरफ छोटे-मोटे ट्रैफिक नियमों के नाम पर आम नागरिकों को खूब सताया जाता है। यह एक तरह की ‘चयनात्मक कार्रवाई’ है, जो जनता में पुलिस प्रशासन के प्रति गहरा अविश्वास पैदा करती है। जब पुलिस और प्रशासन का रवैया इस तरह का हो कि वे केवल ‘आम आदमी’ को ही निशाना बनाते हैं और बड़ी गड़बड़ियों को अनदेखा करते हैं, तो जनता का प्रशासन के प्रति विद्रोही रुख अपनाना स्वाभाविक है।

छोटे-मोटे कामों के नाम पर उत्पीड़न

सर्वे में सामने आए एक और गंभीर पहलू थे—छोटे-मोटे कामों के कारण आम जनता को परेशान किया जाना। सरकारें अक्सर यह भूल जाती हैं कि कोई भी नागरिक जानबूझकर नियमों का उल्लंघन नहीं करना चाहता। अगर कोई व्यक्ति अपनी दुकान के सामने सामान रख लेता है, तो इसका कारण अक्सर दुकान के अंदर जगह का कम होना होता है। ऐसे में बिना किसी चेतावनी के उसका सामान जब्त कर लेना या भारी जुर्माना लगाना, न्याय की बजाय लूट का पर्याय बन गया है।

स्वच्छता के नाम पर चलाए जाने वाले ये अभियान अब ‘जनता की सेवा’ के बजाय ‘जनता को सजा देने’ के औजार बन गए हैं। जनता का मानना है कि अगर सरकार को स्वच्छता लानी ही है, तो पहले उसे बुनियादी ढांचे को मजबूत करना होगा। आप लोगों को डरा-धमका कर स्वच्छ नहीं कर सकते। स्वच्छता एक भावना है, जो तभी जाग्रत होती है जब सरकार भी अपनी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाए।

दिल्ली को कूड़े से आजादी-स्वच्छता अभियान 2026

अब बात करते हैं दिल्ली सरकार द्वारा शुरू किए गए बड़े-बड़े दावों की। दिल्ली सरकार ने राजधानी को कूड़े के ढेर से मुक्त कराने और इसे एक पूरी तरह से स्वच्छ शहर के रूप में स्थापित करने के लिए ‘दिल्ली को कूड़े से आजादी-स्वच्छता अभियान 2026’ की शुरुआत की है। सुनने में यह अभियान बहुत ही सुंदर और दूरदर्शी लगता है। लेकिन जब इस कागजी अभियान को उत्तम नगर जैसे इलाकों की जमीनी हकीकत के साथ रखकर देखा जाता है, तो यह एक मजाक से कम नहीं लगता।

सवाल यह है कि जिस दिल्ली में आज भी बरसात होते ही सीवर उफान मारते हैं, जहां कूड़ा इकट्ठा होने से डंपिंग ग्राउंड के पास के इलाकों में जहरीली गैसें फैलती हैं, जहां झुग्गी-झोपड़ियों और आवासीय क्षेत्रों के बीच कूड़ा इकट्ठा होने का कोई वैज्ञानिक तरीका नहीं है, वहां 2026 तक ‘कूड़े मुक्त’ दिल्ली का सपना कैसे पूरा होगा?

2026 तक का इंतजार इसलिए भी भ्रामक है क्योंकि सरकारें इस लंबे समय को एक बहाने के रूप में इस्तेमाल करती हैं। वर्तमान में जो जनता परेशान है, उसके लिए 2026 कोई मददगार नहीं है। अगर कोई व्यक्ति आज सीवर के पानी में गिरकर बीमार पड़ रहा है, तो 2026 का वादा उसकी इलाज की फीस नहीं देगा। यह अभियान अक्सर प्रेस कॉन्फ्रेंस, विज्ञापनों और बैनरों तक सीमित रह जाता है। जब तक यह अभियान मैदानी स्तर पर काम करने वाले सफाई कर्मचारियों, जल बोर्ड के इंजीनियरों और थाना प्रभारियों के दफ्तरों तक नहीं पहुंचता, तब तक यह सिर्फ एक नारा बनकर रह जाएगा।

नौकरशाही और राजनीतिक अर्थव्यवस्था का खेल

इस पूरे मसले को गहराई से समझने के लिए हमें दिल्ली की नौकरशाही और राजनीतिक अर्थव्यवस्था को समझना होगा। जब कोई भी बड़ा अभियान चलाया जाता है, तो उसके लिए बजट आवंटित किया जाता है। इस बजट का एक बड़ा हिस्सा विज्ञापन और प्रचार में चला जाता है। दूसरा हिस्सा ठेकेदारों की जेब में जाता है। जो थोड़ा बचता है, वह मैदानी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों तक पहुंचते-पहुंचते इतना मामूली हो जाता है कि उससे कोई बड़ा बदलाव नहीं आता।

उत्तम नगर में जो लापरवाही देखी गई, वह इसी चक्र का परिणाम है। ठेकेदारों को सीवर सफाई का पैसा मिलता है, लेकिन वह सिर्फ कागज पर सफाई दिखाता है। पुलिस को यातायात व्यवस्था सुधारने के लिए संसाधन दिए जाते हैं, लेकिन वह संसाधनों का इस्तेमाल ‘चालान राज’ चलाने में करती है, ताकि राजस्व का लक्ष्य पूरा हो सके। इस पूरी व्यवस्था में ‘आम आदमी’ सबसे निचले पायदान पर खड़ा है, जिसे एक तरफ से टैक्स देना पड़ता है और दूसरी तरफ उसी टैक्स के रूप में मिली सुविधाओं की कमी के कारण प्रताड़ित होना पड़ता है।

‘दिल्ली को कूड़े से आजादी’ का अभियान तभी सफल होगा, जब दिल्ली सरकार अपने दफ्तरों से निकलकर इन गलियों में आएगी और बिना किसी पूर्व सूचना के जनता की परेशानियों को महसूस करेगी। स्वच्छता किसी प्रोजेक्ट की तरह नहीं होती, यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है, जिसका आधार जनभागीदारी है। और जब तक सरकार जनता को दोष देने की बजाय खुद जिम्मेदारी नहीं लेगी, तब तक ये कागजी अभियान और जनता का गुस्सा, दोनों साथ-साथ चलते रहेंगे। स्वच्छता के नाम पर अगर जनता को ही परेशान किया जाएगा, तो एक दिन यही परेशान जनता सरकारों को सत्ता से सफाई करा देगी। यही लोकतंत्र का सच है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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