Delhi News: दिल्ली हाईकोर्ट ने कानून अपने हाथ में लेने वालों के खिलाफ एक सख्त रुख अपनाते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि भीड़भाड़ वाली जगह पर रिवॉल्वर दिखाकर धमकाना और हवा में फायरिंग करना कोई निजी झगड़ा नहीं, बल्कि समाज के लिए गंभीर खतरा है। ऐसे मामलों को सिर्फ आपसी समझौते के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।
जस्टिस गिरीश कठपालिया की बेंच ने प्रॉपर्टी विवाद में रिवॉल्वर तानकर हवा में फायरिंग करने वाले एक बिल्डर की याचिका को खारिज करते हुए आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज एफआईआर रद्द करने से साफ इनकार कर दिया। साथ ही, कोर्ट ने आरोपी बिल्डर पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

क्या है पूरा मामला?
दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल याचिका और एफआईआर के मुताबिक, आरोपी बिल्डर का शिकायतकर्ता के पिता के साथ प्रॉपर्टी को लेकर विवाद चल रहा था। इसी विवाद के दौरान आरोपी ने गुस्से में आकर रिवॉल्वर तान लिया और जान से मारने की धमकी दी। लोगों में दहशत फैलाने के लिए उसने हवा में गोली भी चला दी, जिसके बाद वह मौके से फरार हो गया।
बचाव पक्ष ने दिया समझौते का हवाला, पुलिस ने किया विरोध
बचाव पक्ष ने कोर्ट में दलील दी कि घटना के दौरान शिकायतकर्ता को कोई शारीरिक नुकसान नहीं पहुंचा है और अब दोनों पक्षों ने आपसी समझौता कर लिया है, इसलिए केस को खत्म कर दिया जाना चाहिए।
हालांकि, दिल्ली पुलिस ने इस दलील का कड़ा विरोध किया। पुलिस का स्टैंड था कि आर्म्स एक्ट के मामले सिर्फ दो लोगों के बीच का विवाद नहीं होते, बल्कि सार्वजनिक जगह पर फायरिंग का असर पूरे समाज पर पड़ता है।
‘कानून हाथ में लेने वालों को राहत देना गलत संदेश होगा’
दिल्ली पुलिस की दलील से सहमति जताते हुए जस्टिस कठपालिया ने कहा कि सार्वजनिक जगह पर फायरिंग करना एक बेहद गंभीर अपराध है। कोर्ट ने कहा कि बंदूक के दम पर कानून हाथ में लेने वालों को राहत देना गलत संदेश देगा और इससे ऐसे बेखौफ कानून तोड़ने वाले लोगों का हौसला बढ़ेगा।
कोर्ट का आदेश- 25 हजार का जुर्माना
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आपसी समझौता हो जाने के आधार पर ऐसे गंभीर मामलों में कोर्ट अपनी विशेष शक्तियों (Special Powers) का इस्तेमाल नहीं कर सकती। कोर्ट ने बिल्डर की याचिका को पूरी तरह बेबुनियाद बताते हुए खारिज कर दिया।
साथ ही, कोर्ट ने आरोपी बिल्डर पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया और आदेश दिया कि यह रकम एक हफ्ते के भीतर दिल्ली हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी (DHCLSC) में जमा कराई जाए। अब इस मामले में पुलिस की जांच और कोर्ट का मुकदमा अपनी जगह चलता रहेगा।

























