The pace of change in Bihar’s politics: लोकतंत्र की सुंदरता और क्रूरता दोनों एक साथ इस बात में निहित है कि यहां जनादेश किसी भी पल पलट सकता है। कोई भी राजनीतिक दल, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली, संगठनात्मक रूप से कितना भी मजबूत और संसाधनों से समृद्ध क्यों न हो, यदि जनता के आक्रोश को नजरअंदाज करे, तो उसे जमीन पर उतरकर कड़वी हकीकत का सामना करना पड़ता है। बिहार के बिकापुर उपचुनाव का परिणाम इसी कड़वी हकीकत का जीवंत उदाहरण है। प्रशांत किशोर की पार्टी ‘जन सुराज’ की इस सीट पर ऐतिहासिक जीत और भाजपा की 15 साल पुराने किले के धराशायी होने की घटना को सिर्फ एक स्थानीय चुनावी उतार-चढ़ाव के तौर पर देखने की भूल नहीं की जा सकती। यह एक गहरे सियासी संदेश का प्रतीक है—एक संदेश का, जिसकी शुरुआत दिल्ली के जंतर-मंतर से हुई और जिसकी अंतिम पुष्टि बिहार की जनता ने बैलट बॉक्स के जरिए की है।
15 साल का किला और उसकी ढहती दीवारें
किसी भी राजनीतिक दल के लिए एक निश्चित सीट पर लगातार एक दशक से अधिक समय तक काबिज रहना एक छोटी बात नहीं होती। यह दर्शाता है कि वहां पार्टी का संगठन जड़ें जमा चुका है, मतदाताओं का एक बड़ा तबका उसके विचारधारा या प्रदर्शन से आसक्त है और विपक्ष का अस्तित्व सीमांत हो चुका है। बिकापुर में भाजपा का ऐसा ही आंकड़ा था। पिछले 15 वर्षों से यह सीट भाजपा के खाते में जमा थी। लेकिन राजनीति विज्ञान का एक सिद्धांत है कि जब कोई पार्टी लंबे समय तक सत्ता में बनी रहती है, तो उसमें ‘सत्ता का घमंड’ और ‘जनसंपर्क की कमी’ आने लगती है।
बिकापुर में जो हुआ, वह इसी घमंड के टूटने की कहानी है। भाजपा ने शायद यह मान लिया था कि इस सीट पर तो उसका कब्जा अटल है और चुनाव केवल औपचारिकता है। लेकिन राजनीतिक भूकंप तब आता है, जब जनता के मन में पड़ा हुआ छुपा हुआ आक्रोश बाहर आता है। भाजपा ने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी, केंद्रीय नेतृत्व से लेकर राज्य स्तरीय नेताओं तक ने यहां प्रचार किया, लेकिन जनता ने जो प्रतिक्रिया दी, वह न केवल हैरान करने वाली थी, बल्कि एक चेतावनी भी थी। आम जनता ने भाजपा का साथ छोड़कर एक नवोदित राजनीतिक शक्ति को अपना प्रतिनिधि चुना, जो बताता है कि अब मतदाता पारंपरिक बहुमत के फॉर्मूले से ऊब चुका है।
एक बीज जो बिकापुर में पल्लवित हुआ
बिकापुर की हार को समझने के लिए हमें दिल्ली के जंतर-मंतर की ओर दृष्टिपात करना होगा। जंतर-मंतर पर हुआ आंदोलन कोई आम सड़क पर निकलने वाला विरोध प्रदर्शन नहीं था, यह एक ऐसे वर्ग का गुस्सा था, जिसे हमेशा भाजपा का ‘मुख्य वोट बैंक’ माना जाता रहा है। चाहे वह किसान हों, या बेरोजगार युवा, या फिर मध्यम वर्ग के उन लोगों का सबका, जो महंगाई और बेरोजगारी की मार झेल रहा था। जंतर-मंतर पर जो तस्वीरें उभरीं—पुलिस बैरिकेड्स, आंसूगैस के गोले और आंदोलनकारियों का डटा रहना—उसने देश के एक बड़े हिस्से के मन में एक गहरा तकलीफदेह सवाल खड़ा कर दिया।
यह सवाल था—क्या सरकार सुनना बंद कर चुकी है? जंतर-मंतर का आंदोलन दिल्ली तक सीमित नहीं रहा। सोशल मीडिया और समाचार चैनलों के इस युग में, दिल्ली में दर्ज किए गए आंदोलन की गूंज सीधे देश के सबसे सुदूर गांवों तक पहुंच गई। बिहार जैसे राज्य में, जहां प्रवासी मजदूरों की बड़ी आबादी दिल्ली-एनसीआर में काम करती है और किसानों की अच्छी खासी संख्या कृषि कानूनों और एमएसपी से जुड़ी रही है, जंतर-मंतर की आग का असर गहराई से हुआ।
बिकापुर के मतदाताओं ने जब बैलट पेपर पर अपनी मोहर लगाई, तो उसमें शायद सिर्फ स्थानीय मुद्दे ही नहीं, बल्कि जंतर-मंतर पर दिखाई दिए उस ‘असहिष्णु राज्य व्यवस्था’ के विरोध का भी इंजेक्शन था। यह हार भाजपा सरकार के उस दावे की कलई खोल रही है कि जनता का गुस्सा केवल सत्ता विरोधी दलों द्वारा हवा दिए जाने वाला एक छोटा सा शोर है। बिकापुर ने साबित किया कि यह शोर अब सियासी सुनामी बन चुका है।
प्रशांत किशोर और ‘जन सुराज’ का जादू
इस चुनावी नाटक के एक और महत्वपूर्ण पात्र हैं प्रशांत किशोर। एक चुनावी रणनीतिकार से राजनीतिक नेता बनने तक का उनका सफर अत्यंत अनूठा है। प्रशांत किशोर ने जब ‘जन सुराज’ की नींव रखी थी, तब राजनीतिक पंडितों ने इसे एक प्रयोग के तौर पर देखा था। कहा गया था कि चुनाव जीतने वाले रणनीतिकार क्या खुद चुनाव जीत पाएंगे? लेकिन बिकापुर ने यह साबित कर दिया कि प्रशांत किशोर भाजपा की राजनीतिक गणित को भलीभांति समझते हैं।
उन्होंने भाजपा के खिलाफ जो मोर्चा खोला, वह किसी भी पारंपरिक विपक्षी पार्टी से बिल्कुल अलग था। प्रशांत किशोर ने भाजपा के ‘विकास और राष्ट्रवाद’ के नैरेटिव को चुनौती देने के लिए ‘स्थानीय मुद्दों, रोजगार और युवा शक्ति’ का नैरेटिव सामने रखा। उन्होंने बिकापुर की जनता से सीधा संवाद स्थापित किया और जंतर-मंतर जैसे राष्ट्रीय मुद्दों को स्थानीय संदर्भ में बैठाकर पेश किया।

जन सुराज की जीत यह भी दर्शाती है कि बिहार की जनता अब पुराने राग से मुक्त होकर नई राजनीतिक वैकल्पिक शक्ति की तलाश में है। प्रशांत किशोर ने इस खालीपन का फायदा उठाया। उन्होंने भाजपा के खिलाफ एक ऐसा ‘सॉफ्ट नेशनलिज्म’ और ‘डेवलपमेंट विद एम्पाथी’ का मिश्रण तैयार किया, जो भाजपा के कठोर और अक्सर असंवेदनशील ढांचे के ठीक विपरीत था।
भाजपा की रणनीतिक विफलता
बिकापुर की इस करारी हार के लिए भाजपा को अपने ही आंतरिक ढांचे पर गंभीरता से मंथन करना होगा। पिछले कुछ वर्षों में भाजपा की राजनीति बेहद ‘केंद्रीय नेतृत्व-प्रधान’ हो गई है। चुनाव लड़ने का ढांचा अब स्थानीय नेताओं के कंधों से उठकर सीधे दिल्ली के लाल किले या प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंच गया है। हालांकि, यह रणनीति 2014 और 2019 में जादू जैसा काम करती थी, लेकिन 2024 के बाद के भारत में इसका असर कम होता जा रहा है।
जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी सड़कों पर थे, तब भाजपा के स्थानीय नेता और विधायक अक्सर अपने घरों में चुप बैठे नजर आए। जनता को लगने लगा कि उनके स्थानीय प्रतिनिधि उनकी आवाज सुनने में असमर्थ या अनिच्छुक हैं। बिकापुर में भाजपा ने जब चुनाव प्रचार शुरू किया, तो उसके पास स्थानीय स्तर पर कोई ठोस उपलब्धि या मुद्दा पेश करने को नहीं था। केंद्र सरकार की योजनाओं का बखान करना ही उसकी एकमात्र रणनीति रह गई थी।
लेकिन मतदाता अब इतना परिपक्व हो चुका है कि वह केंद्र सरकार की योजनाओं और स्थानीय स्तर पर होने वाली उपेक्षा के बीच का अंतर भलीभांति समझता है। भाजपा के बूथ स्तरीय कार्यकर्ताओं में भी एक निराशा देखी गई, क्योंकि जब ऊपर से आदेश आते हैं कि ‘सब सही है, विकास हो रहा है’, जबकि जमीनी हालात इसके उलट हों, तो कार्यकर्ता भी जनता के सामने जवाब देने से घबराते हैं। यही कारण रहा कि भाजपा अपने 15 साल के गढ़ को बचाने में नाकाम रही।
भारतीय लोकतंत्र का स्वस्थ संकेत
इस पूरे घटनाक्रम को एक बड़े लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य में भी देखने की जरूरत है। जब कोई पार्टी बहुमत के बल पर इतनी शक्तिशाली हो जाती है कि विपक्ष का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए, तब लोकतंत्र में सत्ता के संतुलन की जरूरत महसूस होती है। बिकापुर में जन सुराज की जीत इसी संतुलन की तलाश है। यह बताता है कि भारतीय मतदाता अपनी बुद्धिमत्ता और लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करना जानता है।
जंतर-मंतर पर जो लोग लाठियां खाकर वापस लौटे, उनका गुस्सा नफरत में नहीं, बल्कि एक सुधार की उम्मीद में बदला है। बिकापुर का मतदाता उसी उम्मीद का प्रतिनिधित्व करता है। यह हार भाजपा को एक सिख दे रही है कि लोकतंत्र में सत्ता का असली मालिक जनता है, और जनता को दिल्ली के वीआईपी कल्चर, सुरक्षा घेरों और बैरिकेड्स से नहीं रोका जा सकता। जनता अपना जवाब मतपेटी के जरिए देती है, और यह जवाब अक्सर बहुत तेज और दर्दनाक होता है।


























