दिल्ली जल बोर्ड की बदहाली,डूबती दिल्ली, जागती जनता

दिल्ली जल बोर्ड (DJ) की कार्यप्रणाली को अगर गहराई से देखा जाए, तो यह एक खुली चुनौती लगती है। हर वर्ष मानसून से पहले दिल्ली जल बोर्ड के अधिकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह दावा करते हैं कि शहर भर में सीवरों और नालों की सफाई का काम 100 प्रतिशत पूरा हो चुका है। लेकिन जैसे ही पहली बारिश का पानी गिरता है, यह सारा 'दिखावा' धुल जाता है।

मानसून: प्रकृति का उपहार या प्रशासन की नाकामी?

HIGHLIGHTS

  • बहता पानी, डूबता तंत्र
  • नरेला में बही दो जानें
  • गड्ढे ने ली बचपन की जान
  • शिकायतों का अंधेरा घर

बारिश का मौसम किसी भी शहर के लिए प्रकृति का एक वरदान साबित हो सकता है, लेकिन जब बात राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की हो, तो यह वरदान तुरंत ही एक अभिशाप में बदल जाता है। दिल्ली, जिसे दुनिया के सबसे विकसित और सुव्यवस्थित शहरों में गिना जाता है, बारिश की पहली बौछार के साथ ही अपना असली और बदहाल चेहरा दिखाने लगती है।

आए दिन सीवर की सफाई न होना, नालों का जाम होना और सड़कों पर तब तक पानी भरा रहना जब तक कि कोई बड़ा हादसा न घट जाए, यह अब दिल्ली के इतिहास का एक दुखद अध्याय बन चुका है। इसी क्रम में नरेला इलाके में गुरुवार, 13 अगस्त को घटी उस भयावह घटना ने पूरे देशवासियों को झकझोर कर रख दिया है। यह मात्र एक हादसा नहीं है, बल्कि दिल्ली जल बोर्ड और नगर प्रशासन की घोर लापरवाही, बेपरवाही और तंत्र की व्यवस्थित विफलता का चेहरा है, जिसकी कीमत दो मासूम जानों से चुकाई गई है।

नरेला की त्रासदी

घटना की बात करें तो यह वाकया दिल्ली के नरेला स्थित 100 फुटा रोड पर डीडीए (DDA) फ्लैट्स के पास का है। बवाना इलाके के निवासी 9 और 11 वर्ष के दो मासूम बच्चे, जिनकी उम्र तो ऐसी थी कि उन्हें जीवन के असली मतलब और खतरों का अंदाजा भी नहीं होता होगा, वे खेलते-खेलते या शायद बारिश का मजा लेते हुए उस गड्ढे में पहुंच गए। यह गड्ढ़ कोई साधारण गड्ढा नहीं था, बल्कि सीवर निर्माण या निकासी की अधूरी प्रक्रिया का जहरीला परिणाम था, जिसमें बारिश का पानी इतना भर गया था कि आंखों को धोखा देने वाला यह तालाब समुद्री गहराई में बदल चुका था। दोनों बच्चे उसमें डूब गए और जब तक उन्हें बाहर निकाला जा सका, तब तक उनकी सांसें थम चुकी थीं।

यह घटना सिर्फ एक परिवार के लिए शोक का पहाड़ नहीं है, बल्कि उन सभी अभिभावकों के लिए एक डर का पैगाम है, जो इस शहर के किसी न किसी कोने में ऐसे खुले और असुरक्षित गड्ढों के पास रहते हैं। सवाल यह है कि आखिर एक आवासीय क्षेत्र (डीडीए फ्लैट्स) के इतने करीब इतना बड़ा और खतरनाक गड्ढा क्यों खुला पड़ा था? क्या इसे बचाव के लिए कोई रेलिंग लगाई गई थी? क्या इसके आसपास कोई चेतावनी संकेत लगा था? और सबसे बढ़कर, बारिश से पहले यहां की निकासी व्यवस्था क्यों नहीं दुरुस्त की गई? इन सभी सवालों का जवाब एक शब्द में निहित है—लापरवाही।

कागजों पर तैयारी, जमीन पर सन्नाटा

दिल्ली जल बोर्ड (DJ) की कार्यप्रणाली को अगर गहराई से देखा जाए, तो यह एक खुली चुनौती लगती है। हर वर्ष मानसून से पहले दिल्ली जल बोर्ड के अधिकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह दावा करते हैं कि शहर भर में सीवरों और नालों की सफाई का काम 100 प्रतिशत पूरा हो चुका है। लाखों रुपये के ठेके निकाले जाते हैं, सीवर क्लीनिंग मशीनों की तस्वीरें अखबारों और सोशल मीडिया पर छापी जाती हैं, लेकिन जैसे ही पहली बारिश का पानी गिरता है, यह सारा ‘दिखावा’ धुल जाता है।

सच्चाई यह है कि सीवर की सफाई का काम अक्सर कागजों पर ही समाप्त हो जाता है। ठेकेदार माफिया और जल बोर्ड के कर्मचारियों के बीच की मिलीभगत इतनी गहरी है कि जमीनी स्तर पर काम होने के बजाय बिलों का भुगतान कर दिया जाता है। जब तक इस धोखाधड़ी का असल चेहरा सामने आता है, तब तक कोई न कोई निरीह जान इसकी भेंट चढ़ चुकी होती है। नरेला में हुई इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि दिल्ली जल बोर्ड की सफाई एक महज ‘फॉर्मैलिटी’ है, जो बारिश के मौसम में सबसे ज्यादा नंगा और खतरनाक रूप धारण कर लेती है। सीवर जाम होने के कारण सड़कों पर गंदा पानी भर जाता है, जो संक्रमण का केंद्र बन जाता है, लेकिन नरेला जैसे मामलों में तो यह पानी मौत का दरिया बनकर बह रहा है।

शिकायतों का अंधेरा घर

आज का दौर तकनीक का दौर है। दिल्ली सरकार और जल बोर्ड अक्सर ‘डिजिटल इंडिया’ की बात करते हैं। ऑनलाइन पोर्टल, व्हाट्सएप नंबर और मोबाइल ऐप्स के जरिए शिकायतें दर्ज करने की सुविधा दी जाती है। लेकिन इन नरेला जैसी घटनाएं इस डिजिटल व्यवस्था की पोल खोलती हैं। रिकॉर्ड्स के अनुसार, इलाके के लोगों ने स्थानीय नेताओं, एलजी (लेफ्टिनेंट गवर्नर) कार्यालय, मुख्यमंत्री (सीएम) कार्यालय और जल बोर्ड के ऑनलाइन पोर्टल पर कई बार शिकायतें दर्ज कराई होंगी। लेकिन इन शिकायतों का क्या होता है?

ये शिकायतें डिजिटल अंधेरे घर में जाकर दब जाती हैं। कभी-कभी तो ऑटो-जनरेटेड मैसेज आता है कि “आपकी शिकायत का समाधान कर दिया गया है,” जबकि जमीनी हालात बिल्कुल उलटे होते हैं। जब तक कोई बड़ा हादसा नहीं होता, तब तक इन छोटी-मोटी कंप्लेन्स को अवैध रूप से एवाईड (Avoid) कर दिया जाता है। प्रशासनिक अमले की मानसिकता स्पष्ट है—”जब तक आग न लगे, बुझाने की कोई जरूरत नहीं।” लेकिन यहां आग लगने का मतलब है किसी निर्दोष की जान जाना। क्या प्रशासन को किसी बच्चे की जान की कीमत पर ही सरकारी मशीनरी की नींद टूटती है? यह एक बेहद शर्मनाक और गंभीर सवाल है।

वीआईपी कल्चर बनाम आम आदमी की जिंदगी

दिल्ली की सड़कों और सीवर व्यवस्था में एक और परत छिपी है—वीआईपी कल्चर। अगर बारिश के दौरान किसी वीआईपी रूट पर पानी भर जाता है, तो जल बोर्ड और नगर निगम की मशीनरी रातों-रात हरकत में आ जाती है। पंप सेट लग जाते हैं, सफाई कर्मचारी तैनात किए जाते हैं और कुछ ही घंटों में सड़क सूखी नजर आती है। लेकिन जब बात नरेला, बवाना, उत्तम नगर, मोहन गार्डन, बुद्ध बाजार और दिल्ली के अन्य इलाकों की होती है, जहां गरीब और मध्यवर्गीय परिवार रहते हैं, तो वहां की समस्याओं को कोई देखने वाला नहीं होता।

यह दोहरा मापदंड लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। क्या वीआईपी की सुरक्षा और सुविधा आम नागरिक की जान से बढ़कर है? नरेला में जो गड्ढा बना हुआ था, अगर वह किसी मंत्री या उच्चाधिकारी के आवास के पास होता, तो क्या वह खुला रह पाता? बिल्कुल नहीं। यह विडंबना है कि जिस जनता ने इन अधिकारियों को सत्ता में बैठाया है, उसी जनता के बच्चे सड़क किनारे बने गड्ढों में डूबकर मर रहे हैं, और अधिकारी अपने एयरकंडीशन्ड कक्षों से बयान जारी कर रहे हैं।

प्रकृति का उपहार या प्रशासन की परीक्षा?

हर साल बारिश आती है, यह कोई अप्रत्याशित आपदा नहीं है। मौसम विभाग हफ्तों पहले ही बारिश की तारीखों का अनुमान लगा लेता है। फिर भी दिल्ली जल बोर्ड और नगर निगम हमेशा बारिश के आने पर ‘चौंक’ जाते हैं, जैसे बारिश किसी अनचाहे या अज्ञात ग्रह का प्रभाव हो। यह चौंकना वास्तव में उनकी तैयारी की कमी को छिपाने का एक बहाना है।

सीवर लाइनों का डिजाइन ही इतना पुराना और अपर्याप्त क्यों है कि थोड़ी सी बारिश से वह बह जाती हैं? नए आवासीय क्षेत्रों में जल निकासी के आधुनिक तंत्र का इंतजाम क्यों नहीं हो पाता? सड़कें बनाते समय जल निकासी के स्लॉट क्यों नहीं बनाए जाते? इन सवालों का जवाब सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और योजनाओं में धांधली से जुड़ा है। सड़क निर्माण में कटी चांदी और सीवर लाइन बिछाने में घटिया सामग्री का इस्तेमाल आम जनता को बारिश में सिर्फ जलभराव नहीं देता, बल्कि उसे मौत के मुंह तक ले जाता है। नरेला का वह गड्ढा भी किसी निर्माण कार्य की अधूरी या गलत प्लानिंग का ही परिणाम था, जिसे समय रहते सील नहीं किया गया।

जवाबदेही का खेल और निरीह बच्चों के शव

हर बार जब ऐसा कोई भयावह हादसा होता है, तो तुरंत एक रस्म अदायगी शुरू हो जाती है। राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल शुरू कर देते हैं। एक दूसरे की सरकार या संस्था को घेरने लगते हैं। इस बीच, मृतकों के परिवारों को कुछ लाख रुपये का मुआवजा घोषित कर दिया जाता है, जैसे किसी बकरी के बच्चे के मरने पर उसका मूल्य अदा किया जा रहा हो।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है। नरेला में 100 फुटा रोड पर जो गड्ढा था, उसे बनाने वाली एजेंसी कौन थी? उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी? बारिश से पहले जल निकासी की व्यवस्था करने के लिए किस अधिकारी ने फाइल पर हस्ताक्षर किए थे? क्या उन अधिकारियों और ठेकेदारों के खिलाफ कोई एफआईआर (FIR) दर्ज की जाएगी? क्या उन्हें निलंबित किया जाएगा? इतिहास गवाह है कि ऐसे मामलों में सबसे ज्यादा सजा किसी निचले स्तर के कर्मचारी या ठेकेदार के सुपरवाइजर को मिलती है, जबकि जो लोग इस भ्रष्ट प्रणाली को चलाते हैं, वे सुरक्षित बच जाते हैं। जब तक इस ‘सिस्टम’ में जवाबदेही की संस्कृति नहीं आएगी, तब तक नरेला जैसी त्रासदियां रुकने का नाम नहीं लेंगी।

अभिभावकों की चिंता और सामाजिक जागरूकता की दुविधा

इस घटना ने एक बार फिर बच्चों की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। अक्सर हादसे के बाद नैतिक पुलिसिंग शुरू हो जाती है और अभिभावकों पर यह जिम्मेदारी थोप दी जाती है कि “आपने अपने बच्चों पर नजर क्यों नहीं रखी?” यह तर्क पूरी तरह से असंवेदनशील और तटस्थ है। घर के अंदर बच्चों को कैद करके क्या उनका पालन-पोषण हो सकता है? बच्चों का खेलना, दौड़ना और बाहर जाना उनके शारीरिक और मानसिक विकास का अभिन्न अंग है।

अभिभावकों का कर्तव्य है कि वे बच्चों को खतरों के बारे में जागरूक करें, लेकिन क्या अभिभावक अपने बच्चों को हर गली, हर मोड़ और हर गड्ढे की सुरक्षा के लिए 24 घंटे गार्ड की तरह खड़े रह सकते हैं? यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह नागरिकों, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों को एक सुरक्षित वातावरण प्रदान करे। अगर सरकारी तंत्र अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों से पीछे हट जाए और नागरिकों पर जिम्मेदारी थोप दे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की विफलता है। हां, बातजरूरी है कि सामाजिक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए, जिससे बच्चे बारिश के पानी में न खेलें और खुले निर्माण स्थलों से दूर रहें, लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि सरकार अपनी गलतियों को इस जागरूकता के अभाव का नाम देकर धो दे।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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