“दर्द आपका, दौलत इनकी”: क्या यही है नया भारत?

राहुल गांधी ने एक बेहद गंभीर बिंदु को उठाया—आज के भारत में शैक्षणिक योग्यता या डिग्री का कोई मतलब नहीं रह गया है। यह बात तब और दर्दनाक हो जाती है, जब हम देखते हैं कि एक आम मध्यवर्गीय परिवार अपनी जीवन भर की बचत, गहने बेचकर या बैंकों से भारी ब्याज पर कर्ज लेकर अपने बच्चों को इंजीनियरिंग या मेडिकल की पढ़ाई कराता है।

'छात्रों की गूंज': राहुल गांधी ने क्यों खोली सरकार की पोल? (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • पेपर लीक और बंद नौकरियां: युवाओं का सिस्टम से टूटना
  • भाजपा के 10 हजार करोड़ और देश के 40 करोड़ बेरोजगार
  • अडानी-अंबानी की चमक और भारत के युवाओं का अंधेरा
  • प्रयागराज का कीचड़ और युवाओं की गूंज: एक नई चेतना

प्रयागराज की धरती, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन और जनसंघर्षों की गवाही ली है, हाल ही में एक ऐसे नजारे की मेजबानी कर रही थी जो आज के भारत की तस्वीर को बयां करता है। जलजमाव और कीचड़ से भरे मैदान में उमड़ी युवाओं की भीड़ और उसमें खड़े कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी। यह कोई आम राजनीतिक रैली नहीं थी, बल्कि एक जख्मी पीढ़ी का आक्रोश था, जिसने अपने डर को पार करके सड़कों पर उतरने का फैसला किया था।

‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के जरिए जो बातें सामने आईं, वे न केवल एक राजनीतिक दल का आरोप-पत्र हैं, बल्कि आज के भारत में चल रही आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था की एक कड़वी हकीकत भी हैं। यह एक ऐसा संपादकीय विश्लेषण है, जो राहुल गांधी के इस भाषण को राजनीतिक बयानबाजी से निकालकर देश के युवाओं के आर्थिक-सामाजिक संघर्ष के संदर्भ में समझने की कोशिश करता है।

शिक्षा का व्यापारीकरण और डिग्री की व्यर्थता

राहुल गांधी ने एक बेहद गंभीर बिंदु को उठाया—आज के भारत में शैक्षणिक योग्यता या डिग्री का कोई मतलब नहीं रह गया है। यह बात तब और दर्दनाक हो जाती है, जब हम देखते हैं कि एक आम मध्यवर्गीय परिवार अपनी जीवन भर की बचत, गहने बेचकर या बैंकों से भारी ब्याज पर कर्ज लेकर अपने बच्चों को इंजीनियरिंग या मेडिकल की पढ़ाई कराता है। उसका विश्वास होता है कि यह सर्टिफिकेट उसके बच्चे के भविष्य की गारंटी है। लेकिन जब वह युवा डिग्री हाथ में लिए बाजार में उतरता है, तो उसे एहसास होता है कि यह डिग्री उसे न तो रोजगार दे सकती है और न ही सम्मान।

आंकड़े इसे साबित करते हैं कि भारत में 1000 युवाओं में से मात्र 12 को ही नौकरी मिल पाती है। इसका मतलब साफ है कि शेष 988 युवा या तो बेरोजगारी की विभीषिका झेल रहे हैं, या फिर अपनी योग्यता से कहीं नीचे के स्तर पर काम करने को मजबूर हैं। जब शिक्षा रोजगार नहीं दे सकती, तो वह शिक्षा नहीं, सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह जाती है। यही वजह है कि आज का युवा हताश और क्रोधित है।

रोजगार के पांच दरवाजे और उनकी बंदी

राहुल गांधी ने रोजगार के पांच दरवाजों की अवधारणा को समझाया, जो वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था की गहरी विफलता को दर्शाती है। आइए इन पांच दरवाजों का विश्लेषण करें:

  • पहला दरवाजा—उत्पादन (मैन्युफैक्चरिंग): विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की रीढ़ की हड्डी मैन्युफैक्चरिंग होती है। चीन, वियतनाम और दक्षिण कोरिया ने इसी के बलबूते अपने युवाओं को रोजगार दिया। लेकिन भारत में ‘मेड इन इंडिया’ के नारे के बावजूद वास्तविकता उल्टी है। नोटबंदी और अचानक लागू किए गए जीएसटी ने छोटे और मध्यम उद्योगों की कमर तोड़ दी। जब तक अर्थव्यवस्था इस झटके से उबरती, तब तक कोरोना महामारी ने आकर अंतिम प्रहार किया। आज देश में मैन्युफैक्चरिंग सिकुड़ती जा रही है, जिससे सबसे ज्यादा नुकसान उन युवाओं को हुआ जो प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, फिटर या फैक्ट्री वर्कर के रूप में रोजगार की तलाश में थे।
  • दूसरा दरवाजा—स्टार्टअप इंडिया: सरकार ने स्टार्टअप को रोजगार का एक बड़ा माध्यम बताया। लेकिन सच्चाई यह है कि किसी भी स्टार्टअप को जमीनी स्तर पर खड़ा करने के लिए पूंजी (फाइनेंसियल सपोर्ट) की जरूरत होती है। राहुल गांधी ने सही कहा कि बैंक एक आम युवा या छात्र को एक रुपये का लोन नहीं देंगे, लेकिन उद्योगपतियों को हजारों करोड़ रुपये का ऋण रातों-रात मंजूर हो जाता है। जब तक वित्तीय संस्थानों में क्रेडिट का बंटवारा समान नहीं होगा, तब तक स्टार्टअप का यह दरवाजा सिर्फ उन कुछ लोगों के लिए खुला रहेगा, जिनके पास पहले से पैसा या भारी पहुंच है।
  • तीसरा दरवाजा—सरकारी नौकरी और इंटर्नशिप: भारत में सुरक्षित भविष्य का पर्याय सरकारी नौकरी है। लेकिन यहां पहुंचना अब एक दुःस्वप्न बन गया है। राहुल गांधी ने बताया कि 150 युवाओं में से मात्र एक को ही सरकारी नौकरी मिल पा रही है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण परीक्षा पत्रों का लीक होना है। पेपर लीक अब कोई एकल घटना नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध बन गया है। जब एक युवा वर्षों की कठिन तैयारी करता है और उसके सामने ऐसा धोखाधड़ी का खेल खेला जाता है, तो यह उसकी मेहनत के साथ उसके अधिकारों का हनन है। इससे युवाओं में व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास पैदा होता है।
  • चौथा दरवाजा—सार्वजनिक क्षेत्र (पब्लिक सेक्टर): एक समय था जब पब्लिक सेक्टर की कंपनियां, सरकारी अस्पताल और स्कूल बड़े पैमाने पर रोजगार देते थे। लेकिन निजीकरण के नाम पर इन संस्थानों की कमर तोड़ी जा रही है। बीएसएनएल, हवाई अड्डे, बंदरगाह और रेलवे जैसे क्षेत्रों में सरकारी संपत्तियों को चुनिंदा उद्योगपतियों के हवाले कर दिया गया है। जब पब्लिक सेक्टर सिकुड़ता है, तो नौकरियां भी सिकुड़ती हैं, क्योंकि निजी क्षेत्र हमेशा ‘लाभ का धंधा’ चलाता है और नौकरियों को कम करने को प्राथमिकता देता है।
  • पांचवां दरवाजा—प्राइवेट जॉब और एआई का खतरा:जब उपरोक्त चारों दरवाजे बंद हो जाते हैं, तो युवा प्राइवेट जॉब की तलाश में जाता है। लेकिन अब यहां भी एक नया खतरा मंडरा रहा है—कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)। जहां पहले कॉल सेंटर, डाटा एंट्री और आईटी सेक्टर में बड़े पैमाने पर नौकरियां थीं, वहां अब एआई धीरे-धीरे मनुष्यों की जगह ले रहा है। सरकार के पास इस तकनीकी बेरोजगारी से निपटने का कोई ठोस रोडमैप नहीं है।

नया तेल और युवाओं की लूट

राहुल गांधी ने एक बेहद आधुनिक और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया—’डेटा’। आज पूंजीवाद की दुनिया में डेटा नया तेल है। भारत दुनिया में सबसे अधिक डेटा उत्पन्न करने वाला देश है और यह डेटा सीधे तौर पर भारत के 40 करोड़ युवाओं के माध्यम से बनता है।

जब आप फोन पर एक मैसेज भेजते हैं, इंटरनेट पर सर्च करते हैं, या यूपीआई के जरिए पेमेंट करते हैं, तो आप डेटा बनाते हैं। कंपनियां इस डेटा को इकट्ठा करके एआई को ट्रेन करती हैं और फिर उसी एआई का इस्तेमाल करके आपको नौकरी से बाहर कर दिया जाता है। राहुल ने सही कहा कि बिना आपके डेटा के एआई का कोई मतलब नहीं है।

लेकिन दुखद यह है कि युवाओं का यह डेटा उनकी मर्जी के खिलाफ बड़ी कॉर्पोरेट घरानों (जैसे जियो और अडानी) को मुफ्त में या बेहद कम कीमत पर बेच दिया जाता है। यह एक प्रकार से डिजिटल लूट है। युवा अपनी जानकारी दे रहा है, उस पर कंपनियां अरबों कमा रही हैं, लेकिन युवा को उसमें से एक पैसा भी नहीं मिल रहा।

क्रॉनी कैपिटलिज्म और सत्ता का खेल

राहुल गांधी के भाषण का सबसे तीखा हिस्सा आर्थिक असमानता पर था। उन्होंने एक कड़वी सच्चाई बोली—”बेटा आपका, दर्द आपका और दौलत इनकी, ये सिस्टम है।” पिछले एक दशक में कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों की संपत्ति में 30 गुना की वृद्धि हुई है। यह संयोग नहीं है कि जिन कंपनियों को सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियां, हवाई अड्डे, बंदरगाह और खनिज के अधिकार मिले, वेी कुछ ही वर्षों में वैश्विक स्तर पर सबसे अमीर लोगों की सूची में शामिल हो गए।

इसके विपरीत, इसी दौरान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खजाने में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई। 150 करोड़ रुपये के बैंक बैलेंस वाली पार्टी आज 10 हजार करोड़ रुपये की पार्टी बन गई है। राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र का यह आसान सा सूत्र है कि जब नीतियां किसी विशेष वर्ग के अनुकूल बनती हैं, तो उस वर्ग का धन स्वाभाविक रूप से उन नीतियों को बनाने वाली राजनीतिक पार्टियों की तरफ प्रवाहित होता है। इसे क्रॉनी कैपिटलिज्म (परजीवी पूंजीवाद) कहते हैं। इस व्यवस्था में बाजार खुला होने का दावा किया जाता है, लेकिन प्रतिस्पर्धा को खत्म करके मात्र दो-चार लोगों को ही बाजार पर कब्जा करने की छूट दी जाती है।

संस्थाओं पर कब्जा और लोकतंत्र का क्षरण

राहुल गांधी ने जिस ‘सिस्टम’ की बात की, उसका एक और पहलू संस्थागत कब्जा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत की हर संस्था—चाहे नौकरशाही (ब्यूरोक्रेसी) हो, मीडिया हो, न्यायपालिका (ज्यूडिसरी) हो या फिर विश्वविद्यालय—उसमें एक विचारधारा (RSS के प्रचारकों) का वर्चस्व कायम हो गया है।

जब न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं रहती, तो किसी युवा को न्याय मिलने की उम्मीद नहीं रहती। जब मीडिया सरकार का प्रवक्ता बन जाता है, तो युवाओं के आक्रोश को कोई मंच नहीं मिलता। जब विश्वविद्यालय विचारों के केंद्र की जगह एक विशेष विचारधारा को थोपने के केंद्र बन जाते हैं, तो नवाचार और अनुसंधान मर जाता है। एक ऐसे देश में जहां संस्थाएं अपनी निष्पक्षता खो चुकी हों, वहां आम आदमी, खासकर युवा, पूरी तरह से असहाय हो जाता है। यही वजह है कि आज युवाओं को लगता है कि उनके लिए कोई ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ (समान अवसर का मैदान) नहीं बचा है।

युवाओं की नई चुनौती और जवाबदेही

इस पूरे निराशाजनक माहौल के बीच राहुल गांधी ने जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही, वह यह थी कि देश भर में युवाओं ने अपने डर का सामना करके अंधेरे में रोशनी जलाई है। हाल ही में हुए छात्र आंदोलन—चाहे वे रेलवे की भर्ती के लिए हों, या यूपीएससी की परीक्षा पद्धति के खिलाफ—इनमें एक आम आदमी का डर दिखता है। डर इसलिए नहीं कि वे कायर हैं, बल्कि डर इसलिए क्योंकि सरकारें आंदोलनों को कुचलने के लिए लाठीचार्ज, जलसेना और जेल जैसे हथियारों का इस्तेमाल करती हैं।

इसीलिए राहुल गांधी ने ‘प्यार और स्नेह’ की राजनीति की वकालत की। यह कोई नारा नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक और वैचारिक जरूरत है। जब सत्ता नफरत और तलवार की भाषा बोलती है, तो उसका जवाब नफरत से नहीं, बल्कि एकजुटता और संवेदना से देना होता है। अगर युवा नफरत के रास्ते पर चला, तो सत्ता के पास उसे कुचलने का बहाना मिल जाएगा। लेकिन अगर युवा संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीके से, अपनी संख्याबल के बल पर व्यवस्था परिवर्तन की बात करे, तो यह सबसे बड़ा लोकतांत्रिक हथियार है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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