क्रॉस वोटिंग की मार, भाजपा की हार!

राजस्थान की मुंडवा नगरपालिका में भाजपा को चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी, जहां 10 पार्षद जीतने के बाद भी पार्टी का कोई पार्षद अपनी ही उम्मीदवार को वोट देने को तैयार नहीं हुआ। नतीजा—भाजपा उम्मीदवार शून्य पर सिमट गईं।

एक वोट की दूरी पर खड़ी थी भाजपा की बगावत

HIGHLIGHTS

  • सबसे बड़ा दल, फिर भी सबसे बड़ी शर्मिंदगी
  • जब 10 पार्षद, 10 वोट भी न दे सकें!
  • बेनीवाल-कांग्रेस की जोड़ी, भाजपा पर भारी
  • शून्य पर सिमटी भाजपा, कांग्रेस-आरएलपी को जीत

राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि आंकड़े झूठ नहीं बोलते। लेकिन मुंडवा की ताजा घटना इस कहावत में एक नई व्याख्या जोड़ती है—कि आंकड़े सिर्फ सच नहीं बोलते, कभी-कभी वे दल की दीवारों में पड़ी दरारों को भी रौशन कर देते हैं। राजस्थान के नागौर जिले की मुंडवा नगरपालिका में सोमवार को जो हुआ, वह महज एक स्थानीय चुनाव का नतीजा नहीं है।

यह एक ऐसा राजनीतिक झटका है, जिसने साबित कर दिया कि सर्वाधिक सीटें जीतना और सत्ता की कुंजी अपने हाथ में रखना दो अलग-अलग चीजें हैं और इन दोनों के बीच की खाई को पाटने में जो दल नाकाम रहता है, उसके हिस्से में कभी-कभी ‘शून्य’ आ जाता है।

एक ही वोट की दूरी पर खड़ी सरकारें

इस चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यह है कि जीत और हार के बीच का फासला सिर्फ एक वोट था। कांग्रेस और हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने अपनी साझा उम्मीदवार अलका देवी कंडोई को चेयरमैन पद पर पहुंचा दिया। उन्हें 13 वोट मिले। उधर, भाजपा से बगावत कर निर्दलीय मैदान में उतरे घनश्याम सदावत 12 वोट लेकर रह गए। यानी महज एक वोट के अंतर से तख्त और तख्ते की बाजी पलट गई।

गणित को थोड़ा समझें। 25 वार्डों वाली नगरपालिका में भाजपा ने 10 सीटें जीती थीं, आरएलपी के खाते में 7 और कांग्रेस के खाते में 3 सीटें आईं, जबकि 5 वार्डों पर निर्दलीय पार्षद जीते। कागज पर देखें तो भाजपा की स्थिति सबसे मजबूत थी। कांग्रेस-आरएलपी गठबंधन के पास साफ बहुमत नहीं था; दोनों के पास मिलाकर 10 पार्षद थे। लेकिन वोटिंग के दिन जब पर्दा उठा, तो तस्वीर उल्टा निकली। अलका देवी को उनके गठबंधन के 10 वोटों के अलावा तीन और वोट मिले—जो स्पष्ट रूप से या तो भाजपा के पार्षदों में से आए, या फिर निर्दलीयों में से किसी ने उन पर भरोसा जताया और सबसे चौंकाने वाली बात—भाजपा की आधिकारिक उम्मीदवार गीता देवी को एक भी वोट नहीं मिला। जी हां, शून्य।

‘शून्य’ से बड़ा सवाल: टिकट किसे और क्यों?

इस पूरी घटना में सबसे गहरा घाव भाजपा के लिए यह नहीं कि वह चेयरमैन पद नहीं जीत सकी; सबसे बड़ा सवाल यह है कि उसके अपने ही 10 पार्षद उसके उम्मीदवार के पक्ष में नहीं खड़े हुए। दल-अनुशासन, विधायक दल की बैठक, नेतृत्व की रजामंदी—इन सब रस्मों के बावजूद जब वोट डालने की बारी आई, तो ‘कमल’ के मतदाताओं ने कहीं और रुख कर लिया।

इसके पीछे की वजहें ढूंढना मुश्किल नहीं। घनश्याम सदावत कोई बाहरी शख्स नहीं थे। वे इससे पहले भी पार्षद रह चुके थे और उन्हें भाजपा की वरिष्ठ नेता डॉ. ज्योति मिर्धा के करीबी बताया जाता है। जब पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया, तो उन्होंने बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ा। मामला यहीं नहीं रुका—जिन पार्षदों के बीच सदावत का प्रभाव और अपनापन था, वे चुपचाप उनके साथ चले गए। यानी यह शून्य अचानक गिरा हुआ बिजली की कड़ा नहीं था; यह लंबे समय से जमा होती नाराजगी का विस्फोट था, जिसे पार्टी ने पहले ही भांप लेना चाहिए था।

यह घटना भाजपा के सामने एक पुरानी, लेकिन अनसुलझी बीमारी का इलाज मांगती है—टिकट वितरण में स्थानीय इकाइयों की उपेक्षा। देश के कई हिस्सों में भाजपा का आलाकमान ऐसे कार्यकर्ताओं को टिकट देने से कतराता रहा है, जिनकी स्थानीय पकड़ मजबूत हो लेकिन जो ‘रसूखदार चेहरों’ की दलाली की दौड़ में पीछे रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि जिस पार्टी का दावा है कि वह ‘पार्टी से बड़ा कोई नहीं’ की अनुशासन की देनदार है, उसी पार्टी के मंच पर खड़े पार्षद वोटिंग बूथ के अंदर कोई और गाना गुनगुना रहे होते हैं।

नागौर की जमीन और बेनीवाल का प्रभाव

इस नतीजे को अकेले भाजपा की कमजोरी से नहीं समझा जा सकता। नागौर की धरती अपने आप में एक अलग राजनीतिक पारिस्थितिकी है। यह वह इलाका है, जहां हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का जड़ें जमाने का सिलसिला लंबा है। बेनीवाल खुद नागौर से सांसद रहे हैं और क्षेत्रीय स्तर पर जाट-समेत कई वर्गों में उनका निजी नेटवर्क पत्थर की लकीर की तरह खुदा हुआ है। मुंडवा जैसी नगरपालिका में आरएलपी का सात वार्डों पर जीत हासिल करना इस पकड़ की सीधी पुष्टि करता है।

कांग्रेस के लिए यह जीत और भी अर्थपूर्ण है। खुद के मात्र तीन पार्षद होने के बावजूद कांग्रेस ने समझदारी दिखाई—उसने बड़े दल का गठजोड़ किया और उम्मीदवारी आरएलपी की पार्षद अलका देवी को दे दी। यह वह राजनीति है, जिसे ‘साझेदारी की परिपक्वता’ कहा जा सकता है। बड़े पद के लिए अपने चेहरे पर अड़ने की बजाय जीत को प्राथमिकता देना—यह उदाहरण गठबंधन की राजनीति करने वाले दलों के लिए सीख भरा है।

अजमेर-पाली के उलट मुंडवा

राजस्थान की राजनीति में पिछले कुछ दिनों का एक बड़ा विरोधाभास यही है। अजमेर और पाली में भाजपा ने सबूत दिए कि जिनके पास सीटें कम हों, वे भी हथकंडे और सौदेबाजी से सरकार बना सकते हैं। वहां भाजपा की चुनावी कूटनीति ने अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। लेकिन जयपुर से करीब 250 किलोमीटर दूर मुंडवा की चौखट पर यही खेल उल्टा हो गया—जहां भाजपा के पास सबसे ज्यादा सीटें थीं, लेकिन उसकी हैसियत जीरो पर आकर सिमट गई।

यह विरोधाभास राजनीति की एक अनछुई सच्चाई को छूता है कि स्थानीय निकाय चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों और केंद्रीय नेतृत्व के चेहरे पर तय नहीं होते। ये चुनाव नाली, सड़क, पानी, वार्ड के व्यक्तिगत रिश्ते और उम्मीदवार की ‘घर की पहचान’ पर तय होते हैं। जो दल इन सूत्रों को नजरअंदाज करके सिर्फ पार्टी के झंडे के भरोसे बैठ जाता है, वह मुंडवा जैसी जगहों पर शून्य की हार जरूर झेलता है।

लोकतंत्र की जीत या दल-अनुशासन की मौत?

यहां एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर चिंतन जरूरी है। क्रॉस वोटिंग को कुछ लोग लोकतंत्र की स्वस्थ अभिव्यक्ति भी मानते हैं—कि जनप्रतिनिधि किसी दल के ‘हुक्म’ पर नहीं, बल्कि अपने मर्जी और अपने क्षेत्र के हित पर वोट करे। लेकिन दूसरी तरफ, वही क्रॉस वोटिंग ‘आया-गया’, ‘पैसा-पद’ और ‘घुसपैठ की राजनीति’ का दरवाजा भी खोलती है।

मुंडवा में क्या क्रॉस वोटिंग आदर्शवाद से हुई या स्थानीय नाराजगी से, या फिर किसी और सौदे की परछाईं से—इस पर तो बाहर से टिप्पणी करना कठिन है। लेकिन जितनी भी वजहें हों, एक बात तय है कि जब 10 पार्षदों का एक भी वोट अपने ही दल के उम्मीदवार को न मिले, तो इसका मतलब यह नहीं कि 10 लोग अनुशासनहीन हैं; इसका मतलब यह है कि पार्टी की स्थानीय इकाई, उसका नेतृत्व और उसका निर्णायक तंत्र पूरी तरह फेल हो चुका था। वोटिंग से पहले जहां भाजपा को यह संकेत मिलने चाहिए थे, वहां कोई सेंसर नहीं चला। यह संगठनात्मक विफलता उस हार से कहीं ज्यादा बड़ी है, जो अंतिम परिणाम में दिखी।

बागियों की ताकत: चेतावनी भरा संदेश

घनश्याम सदावत का चुनाव प्रदर्शन इस बात का उत्तम उदाहरण है कि स्थानीय राजनीति में ‘पार्टी का टिकट’ उतना जरूरी नहीं जितना ‘जमीन का रिश्ता’। टिकट छिन जाने के बाद भी सदावत 12 पार्षदों का समर्थन जुटाने में कामयाब रह गए। यानी पार्टी का टिकट छीने बिना भी वे जीत जीतने की स्थिति में थे—बस एक वोट का अंतर रह गया।

यह घटना सभी बड़े दलों के लिए चेतावनी है। देश और प्रदेश में ‘बगावत की राजनीति’ का दौर अपने चरम पर है। टिकट कटने पर बागी उम्मीदवार अब निर्दलीय खड़े होकर या दूसरे दल के झंडे तले मैदान में उतरते हैं और अक्सर मुख्य दल के ही वोट काट लेते हैं। मुंडवा में तो बागी ने सिर्फ वोट नहीं काटे, बल्कि पूरा चेहरा ही बदल दिया। अगर भाजपा ने सदावत को ही टिकट दे दिया होता, तो नतीजा क्या होता, इसका अंदाजा उनके 12 वोटों से लगाया जा सकता है।

राष्ट्रीय स्वाइप की असली कसौटी

बड़े चुनावों में तूफानी जीत दर्ज करने वाले दल अक्सर यह भ्रम पाल लेते हैं कि वही लहर स्थानीय चुनावों में भी चलेगी। लेकिन नगरपालिका, जिला परिषद और पंचायत समिति के चुनावों की अपनी अलग धड़कन होती है। यहां वोटर राष्ट्रीय मुद्दों से नहीं, अपनी गली-मोहल्ले की समस्याओं से जुड़ा होता है। यहां उम्मीदवार का दर्जा उसके ‘पार्टी’ से नहीं, ‘पड़ोस’ से तय होता है।

मुंडवा का नतीजा भाजपा के लिए इसी सच्चाई की पुनरावृत्ति है। प्रदेश में जब सत्ता उसके पास थी, तब भी स्थानीय चुनावों में उसे कई जगह कड़ाई का सामना करना पड़ा था। अब जब प्रदेश में सरकार कांग्रेस के हाथ में है, तो स्थानीय निकायों में कांग्रेस की जीत का रुख स्वाभाविक भी माना जा सकता है। लेकिन मुंडवा में तो भाजपा ने हार नहीं झेली—वह तो खुद अपने ही मैदान से बाहर निकल गई। यह अंतर बहुत बड़ा है।

भाजपा के लिए सबक

भाजपा के लिए यह नतीजा एक आईने की तरह है, जिसमें उसे अपनी स्थानीय संगठन-व्यवस्था का चेहरा देखना चाहिए। टिकट वितरण को दिल्ली और जयपुर के ‘अदने’ से निकालकर जिला स्तर पर ले जाना होगा। वरिष्ठ नेताओं के करीबी और स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच संतुलन बनाना होगा। और सबसे जरूरी—वोटिंग से पहले ही अपने पार्षदों की मन की स्थिति जांचने का तरीका सीखना होगा। क्योंकि दल-अनुशासन का धर्म चेहरे पर गले में गमछा बांधकर नहीं, अपने लोगों के भरोसे को बचाकर बना रहता है।

कांग्रेस-आरएलपी गठबंधन के लिए यह जीत खुशी की खबर तो है, लेकिन इससे बड़ी बात यह है कि अब उन्हें शासन करना है। एक-एक वोट के अंतर से बनी सरकारों की मजबूती हमेशा सवालों के घेरे में रहती है। अलका देवी के लिए चुनौती अब वार्डों की विकास-मांगों को पूरा करने की होगी, क्योंकि जनता अंततः सरकार के ‘गठन’ से नहीं, उसके ‘प्रदर्शन’ पर वोट देती है।

हनुमान बेनीवाल की आरएलपी के लिए मुंडवा एक बड़ा मनोबल वृद्धि है। उनके लिए यह इस बात का प्रमाण है कि क्षेत्रीय दल अपने गढ़ में बड़े दलों को तगड़ी टक्कर दे सकते हैं। लेकिन उन्हें भी यह याद रखना होगा कि गठबंधन में छोटे साझेदार की जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती हैं। आने वाले समय में अगर आरएलपी को नागौर क्षेत्र में अपनी पकड़ और मजबूत करनी है, तो मुंडवा की इस सरकार को कामयाब दिखाना उनके लिए राजनीतिक रूप से लाभदायक साबित होगा।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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