Bihar Jamui Sadar Hospital News: एक सभ्य समाज और कल्याणकारी राज्य की पहचान उसके नागरिकों, विशेषकर गरीब और वंचित वर्ग को स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता से होती है। स्वास्थ्य किसी देश या राज्य के विकास का सबसे महत्वपूर्ण सूचकांक होता है, लेकिन जब इसी स्वास्थ्य व्यवस्था का बुरा हाल हो और अस्पताल मौत के कुएं में तब्दील हो जाएं, तो यह समाज के लिए किसी भयावह अपराध से कम नहीं है। बिहार के जमुई सदर अस्पताल की हालिया ग्राउंड रिपोर्ट न केवल एक अस्पताल की विफलता की कहानी कहती है, बल्कि यह पूरे राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की खोखली नींव को उजागर करती है। 46 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंचते तापमान और ‘रेड अलर्ट’ की घोषणा के बीच, जब मरीज छत के नीचे और फर्श पर तड़प रहे हों, तो समझना कठिन नहीं है कि हमारा प्रशासन जमीनी हकीकत से कितना कटा हुआ है।
जमुई सदर अस्पताल झकझोर
जमुई सदर अस्पताल का दृश्य किसी भी मानवीय संवेदना वाले व्यक्ति को झकझोर देता है। प्रशासन शायद एयर-कंडीशन्ड कमरों में बैठकर ‘लू से बचाव’ की रणनीति बना रहा हो, लेकिन अस्पताल के गेट के बाहर की तस्वीर इस रणनीति की पोल खोलती है। भीषण गर्मी, चिलचिलाती धूप और बिजली की कटौती के बीच वहां इलाज के लिए आए मरीजों के लिए न तो पानी की व्यवस्था है, न ही छांव का। पर्ची कटाने वाले काउंटर पर लंबी कतारें, ओपीडी में डॉक्टरों की अनुपस्थिति और बेवजह भटकने को मजबूर मरीज—यह व्यवस्था किसी ‘सभ्य समाज’ के लिए शर्मनाक है।
इस अराजकता का सबसे दर्दनाक पहलू मरीजों की असहायता है। खैरा क्षेत्र की बुजुर्ग महिला बनारसी देवी, जो चार दिनों से भयंकर पेट दर्द से जूझ रही हैं, उनकी तकलीफ दर्शाती है कि गरीब के लिए सरकारी अस्पताल केवल एक आशा का ढांचा भर बनकर रह गया है। डॉक्टर के न मिलने से वे रोज निराश लौटती हैं, क्योंकि उनकी जेब प्राइवेट अस्पताल के भारी खर्च को नहीं उठा सकती। क्या गरीब का जीवन इतना सस्ता है कि उसे इलाज के अभाव में तड़पना पड़े? मलयपुर की सरिता देवी का भटकना और एक्सरे की व्यवस्था के लिए डेढ़ घंटे तक इधर-उधर भटकना, इस बात का प्रमाण है कि अस्पताल में न तो कोई सूचना व्यवस्था है और न ही कर्मचारियों में मरीजों के प्रति संवेदना।
जमुई सदर अस्पताल बुरी हालत की पहचान
स्वच्छता और सुरक्षा के मानकों की बुरी हालत तो यहां की पहचान बन चुकी है। अस्पताल के बाथरूम और शौचालय गंदगी के ढेर हैं, जहां पानी तक नहीं है। दरवाजे-खिड़कियां टूटी पड़ी हैं और फ्लश खराब है। इतना ही नहीं, सीढ़ियों और बाथरूम के आसपास फेंके हुए सिरिंज और सर्जिकल वेस्ट किसी बड़े संक्रमण को दावत दे रहे हैं। क्या एक अस्पताल, जहां लोगों को स्वस्थ होना चाहिए, वहां खतरनाक बीमारियों के फैलने का अड्डा बनकर रह गया है? यह चिकित्सा व्यवस्था के पतन का सबसे निचला स्तर है।
जिम्मेदार अधिकारियों का रवैया इस स्थिति से उबरने का बड़ा रोड़ा बना हुआ है। जमुई के सिविल सर्जन डॉ. अशोक कुमार सिंह के बयान मीडिया के सामने आने के बाद तो हवाई किले जैसे लगते हैं। एसी और कूलर वाले स्पेशल वार्ड, शीतल पेयजल, 29 प्रकार की दवाइयां और जेनरेटर के दावे तब खोखले साबित होते हैं, जब ओपीडी में डॉक्टर ही न हों। सवाल यह है कि जब मरीज पर्ची कटवाने और डॉक्टर के मिलने की जद्दोजहद में ही थक चुका हो, तो वह स्पेशल वार्ड तक कैसे पहुंचेगा? कागजों पर सुंदर एसओपी (SOP) और जमीन पर बिखरी व्यवस्था के बीच का अंतर यह बताता है कि प्रशासन फाइलों में ही शासन चला रहा है, हकीकत से उसका कोई लेना-देना नहीं।

इमरजेंसी वार्ड में डॉक्टरों की अनुपस्थिति और मरीजों को घंटों इंतजार कराना, यह दर्शाता है कि यहां जीवन और मृत्यु के बीच की लड़ाई में प्रशासन तमाशबीन बना हुआ है। लक्ष्मीपुर की मीना देवी की बेटी को इमरजेंसी पर्ची कटवाने के बाद भी चार घंटे इंतजार करना पड़ा, लेकिन डॉक्टर नहीं मिले। यह स्थिति किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। इमरजेंसी का मतलब ही है तत्काल सहायता, लेकिन जमुई सदर अस्पताल में इमरजेंसी शब्द का अर्थ ही बदल चुका है।
जमुई सदर अस्पताल की अव्यवस्था
अव्यवस्था की पराकाष्ठा तब देखने को मिलती है जब अस्पताल परिसर में सुरक्षा व्यवस्था की ही कमी हो। एक जर्जर जलमीनार जो किसी भी समय गिरकर बड़ा हादसा कर सकता है, वहां खड़ा होना शासन की लापरवाही को दर्शाता है। इस जलमीनार के मलबे से सीटी स्कैन सेंटर का एसी खराब हो जाना और मजबूरन मरीजों को बाहर प्राइवेट सेंटर जाने पर मजबूर होना, यह बताता है कि सरकारी सुविधाओं का सदुपयोग कैसे विफलताओं में बदल रहा है।
इससे भी चौंकाने वाला तथ्य है अस्पताल परिसर में नशेड़ियों का डेरा जमना। एक एम्बुलेंस के बैटरी बॉक्स में शराब की खाली बोतलें मिलना और देर रात तक परिसर में नशेड़ी टोलियों का जमा होना, सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलता है। जब मरीज और उनके परिजन सुरक्षित महसूस नहीं करते, तो वे इलाज पर ध्यान कैसे केंद्रित करेंगे? सुरक्षा गार्डों का केवल मुख्य गेट पर दिखना और परिसर के अंदर का असुरक्षित माहौल, यह साबित करता है कि अस्पताल प्रबंधन अपनी प्राथमिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ चुका है।
जब मीडिया ने इन मुद्दों को उठाया, तो सिविल सर्जन का जवाब और भी निराशाजनक था। मीडिया द्वारा किए जा रहे ‘दुष्प्रचार’ को काम में देरी का कारण बताना, अधिकारियों की मानसिकता को दर्शाता है। सच्चाई को दबाने के लिए संवाद माध्यमों को दोष देना आजकल एक पुरानी और कमजोर कहानी बन चुकी है। सिविल सर्जन का दावा कि जल्द ही समस्याओं का समाधान हो जाएगा, वर्षों से चली आ रही इस लापरवाही पर लगाम लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
जमुई सदर अस्पताल की यह कहानी केवल जमुई की नहीं है, बल्कि यह बिहार के स्वास्थ्य सेवा ढांचे का एक सूक्ष्म चित्रण है। हर दूसरे सरकारी अस्पताल की कहानी कमोबेश ऐसी ही है—डॉक्टरों की कमी, दवाओं की अनुपलब्धता, बुनियादी ढांचे का अभाव और बदतर स्वच्छता व्यवस्था। गरीब की जिंदगी से बड़ी लापरवाही कोई नहीं, यह वाक्य शायद इस स्थिति को सबसे बेहतर तरीके से समझाता है।
आज जनता की आस कब चलेगा जांच का दौर
सवाल यह है कि आखिर कब तक यह आश्वासनों और जांच का दौर चलेगा? कब तक जमीन पर बैठे मरीजों को राहत मिलेगी? बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग को अपनी नींद से जागने की जरूरत है। कागजों में दलील देने से काम नहीं चलेगा। डॉक्टरों की उपस्थिति सुनिश्चित करना, बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त करना और अस्पतालों को सुरक्षित बनाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। जब तक जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं होती और स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं आती, तब तक जमुई जैसे अस्पताल मरीजों के लिए शवगृह से कम नहीं लगेंगे।
अंत में, यह स्थिति न केवल एक प्रशासनिक विफलता है, बल्कि यह एक मानवीय त्रासदी है। शासन और प्रशासन को यह समझना होगा कि अस्पताल की दीवारें जब तक इंसानियत की रक्षा नहीं करेंगी, तब तक कोई भी विकास सार्थक नहीं होगा। जमुई की इस तस्वीर को देखकर बिहार के नीति नियंताओं को चेतना की आवश्यकता है कि गरीब की जिंदगी भी किसी कीमती है, और उसे सम्मान और बेहतर स्वास्थ्य सुविधा का हकदार होना चाहिए। अन्यथा, इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा।






















