भारत-पाक तनाव के बीच भागवत ने दिया संवाद का संदेश

मोहन भागवत ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत किसी भी विवाद का समाधान अपने मित्रों या विरोधियों के साथ विजय प्राप्त करने या उन्हें खत्म करने की रणनीति नहीं, बल्कि समर्पण और संवाद स्थापित करने में देखता है।

मोहन भागवत का बयान: भारत-पाक संबंधों में नए युग की शुरुआत

HIGHLIGHTS

  • मानवता एक है: भागवत का संदेश, भारत-चीन-पाक संबंधों में नई उम्मीद
  • भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों को सुधारने का रास्ता क्या है?
  • संघर्ष के बाद भी संबंधों का पुनर्निर्माण संभव: भागवत का विचार
  • भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव खत्म क्यों नहीं, भागवत ने बताया कारण

भारत के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में मुंबई में आयोजित ‘इंडियाज़ इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस’ (IIMUN) की 15वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त किए, जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। उनके विचार न केवल भारत और पाकिस्तान के संबंधों का ही प्रतिबिंब हैं, बल्कि यह वैश्विक संघर्षों और तनाव के संदर्भ में भी एक नई दिशा का संकेत देते हैं। भागवत का मानना है कि किसी भी विवाद का समाधान विजय प्राप्त करने या विरोधियों को समाप्त करने का तरीका नहीं, बल्कि संवाद और समझदारी का रास्ता है।

विवाद का सामाजिक एवं राजनीतिक समाधान

मोहन भागवत ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत किसी भी विवाद का समाधान अपने मित्रों या विरोधियों के साथ विजय प्राप्त करने या उन्हें खत्म करने की रणनीति नहीं, बल्कि समर्पण और संवाद स्थापित करने में देखता है। उनका यह कथन एक विचारधारा को दर्शाता है कि संघर्ष का समाधान केवल बल या युद्ध के माध्यम से नहीं, बल्कि समझदारी, सहानुभूति और समर्पित संवाद से ही संभव है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारत का मूल दर्शन सहअस्तित्व और मनुष्यता की एकता में निहित है।

यह दृष्टिकोण विशेष रूप से आज के समय में प्रासंगिक है, जब दुनिया भर में संघर्ष, युद्ध और तनाव की स्थिति बनी हुई है। भागवत का यह बयान इस बात का संकेत है कि भारत अपने पड़ोसी देशों और विश्व के साथ शांतिपूर्ण संबंध बनाने के प्रयासों में विश्वास रखता है। उनका यह भी मानना है कि विवादों का स्थायी समाधान संवाद और समझदारी से ही संभव है, न कि सैन्य शक्ति या कठोरता से।

पाकिस्तान: दुश्मन नहीं, पड़ोसी और ऐतिहासिक साझेदारी

एक महत्वपूर्ण बिंदु पर भागवत ने पाकिस्तान के लोगों के प्रति अपनी सोच व्यक्त की। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के लोग पूरी तरह से भारतीयों के दुश्मन नहीं हैं, बल्कि वे भी मानवता का ही हिस्सा हैं। उनका मानना है कि स्थायी शत्रुता किसी समस्या का हल नहीं है, बल्कि यह तो दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक संघर्ष को जन्म देती है। भागवत ने इस बात पर बल दिया कि पाकिस्तान 100 साल पहले तक भारत का ही हिस्सा था और चीन के साथ भी भारतीय संबंध सदियों से बने हुए हैं।

यह ऐतिहासिक संदर्भ हमें यह समझाने में मदद करता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच की दूरी केवल सीमा रेखाओं और राजनीतिक असहमतियों का परिणाम है। इस बीच, दोनों देशों के आम लोग, उनकी संस्कृति और जीवनशैली बहुत हद तक समान हैं। भागवत का यह दृष्टिकोण दोनों देशों के बीच संवाद और समझदारी को प्रोत्साहित करता है, ताकि दीर्घकालिक शांति और स्थिरता कायम की जा सके।

संघर्ष के बाद भी संबंधों की पुनर्स्थापना

भागवत ने कहा कि संघर्ष के समय जब देश की सुरक्षा और संप्रभुता खतरे में होती है, तो सरकार और सेना के फैसले के साथ एकजुट होकर खड़ा होना आवश्यक है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि सैन्य कार्रवाई और राजनैतिक निर्णयों के बाद, संबंधों को समाप्त नहीं किया जाना चाहिए। यदि युद्ध के बाद संबंध टूट जाते हैं, तो इसका समाधान केवल संवाद और पुनर्स्थापना से ही संभव है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब चीन से 2000 साल पुराना संबंध रहा है, तो उसकी महत्ता आज भी कायम है। चीन ने अपने ऐतिहासिक संबंधों का जिक्र करते हुए कहा कि भारतीय मूल्यों और संस्कृति का उनके जीवन में स्थान है। इसी तरह, पाकिस्तान भी, जो कभी भारत का अभिन्न हिस्सा था, के साथ संबंधों को बनाए रखने पर बल दिया।

यह दृष्टिकोण इस बात को रेखांकित करता है कि संघर्ष के बाद भी संबंधों को मजबूत किया जा सकता है, यदि दोनों पक्ष बीच संवाद और समझदारी का रुख अपनाएं। यह विचार आज के भू-राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण है, जहां तनाव और संघर्ष के बीच भी शांति स्थापित करने के रास्ते खोजना आवश्यक है।

दोनों देशों के बीच संबंधों का भावी दृष्टिकोण

भागवत ने भारत और पाकिस्तान के आम लोगों के बीच संबंधों पर भी जोर दिया। उनका मानना है कि दोनों देशों के नागरिक, उनके जीवन, संस्कृति और परंपराएँ एक-दूसरे के लिए मित्रता और साझा विरासत का प्रतीक हैं। उनका यह भी कहना है कि दोनों देशों के बीच तनाव मुख्य रूप से राजनीतिक परिस्थितियों, सीमाओं और अंतरराष्ट्रीय राजनीति का परिणाम है, न कि व्यक्तिगत भावना का।

उन्होंने कहा कि जब देश में संघर्ष या युद्ध की स्थिति हो, तो हमें अपनी सरकार और सेना के फैसलों के साथ मजबूती से खड़ा होना चाहिए। लेकिन, साथ ही, हमें यह भी समझना चाहिए कि मानवता एक है, और एक दिन यह टकराव समाप्त होगा। उस समय हमें फिर से एक होकर मानवता का संदेश फैलाना है।

यह दृष्टिकोण वैश्विक संघर्षों और विशेषकर भारत-पाकिस्तान संबंधों में संवाद और समझदारी का संदेश है। यह दर्शाता है कि दीर्घकालिक शांति और सौहार्द्र के लिए अपने पूर्वाग्रहों और नफरत को त्यागकर, मानवता के आधार पर संबंधों को मजबूत किया जा सकता है।

वर्तमान स्थिति और भविष्य की दिशा

यह वक्तव्य तब आया है जब भारत और पाकिस्तान के बीच मई 2025 में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद सैन्य गतिरोध चरम पर था। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में भारतीय सेना ने कठोर सैन्य कार्रवाई की थी, जिसके बाद तीन दिनों का संघर्ष हुआ। हालांकि युद्धविराम हुआ, लेकिन तनाव अभी भी बना हुआ है। ऐसे में भागवत का बयान दोनों देशों के बीच संवाद की संभावनाओं को बल देता है।

उनका यह कहना कि संघर्ष के बाद भी संबंधों को तोड़ा नहीं जाना चाहिए, भारत की दीर्घकालिक नीति का प्रतिबिंब है। यह नीति पीपुल-टू-पीपुल कनेक्ट और कूटनीतिक संवाद के माध्यम से संबंध सुधारने का प्रयास है। यह दृष्टिकोण न सिर्फ भारत की विदेश नीति का हिस्सा है, बल्कि मानवता के साथ एकता और शांति का संदेश भी है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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