बंदरों को आमतौर पर पेड़ों पर उछलते-कूदते या लोगों के आसपास घूमते देखा जाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के रायबरेली में रहने वाले चुनमुन बंदर की कहानी इससे बिल्कुल अलग थी। वह एक दंपती के लिए पालतू जानवर नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य और बेटे जैसा था। उसकी देखभाल खास तरीके से होती थी, उसके लिए घर में अलग कमरा था और उसकी शादी भी पूरे धूमधाम से कराई गई। चुनमुन की मौत के बाद उसके सम्मान में घर में मंदिर बनवाया गया और उसकी मूर्ति स्थापित की गई।
500 रुपये में घर आया था चुनमुन
राजेश श्रीवास्तव और शबिस्ता की जिंदगी में चुनमुन साल 2005 में आया। बताया जाता है कि उन्होंने उसे करीब 500 रुपये में खरीदा था। चुनमुन की मां की बिजली का झटका लगने से मौत हो गई थी, जिसके बाद वह अकेला रह गया। राजेश और शबिस्ता उसे अपने घर ले आए। शुरुआत में शायद उन्हें अंदाजा नहीं था कि यह छोटा-सा बंदर आगे चलकर उनकी जिंदगी का इतना अहम हिस्सा बन जाएगा।

राजेश हिंदू थे और शबिस्ता मुस्लिम। दोनों ने अलग-अलग धर्मों के बावजूद शादी की थी, लेकिन उनके इस फैसले को परिवार और समाज से आसानी से स्वीकार्यता नहीं मिली। ऐसे दौर में चुनमुन उनके घर आया और धीरे-धीरे उनके अकेलेपन को कम करने लगा। दंपती ने उसे सिर्फ पालतू जानवर की तरह नहीं रखा, बल्कि बेटे की तरह प्यार और देखभाल दी।
AC और हीटर वाले कमरे में रहता था करोड़पति बंदर
चुनमुन की दिनचर्या और सुविधाएं किसी खास परिवार-सदस्य से कम नहीं थीं। गर्मियों में उसके कमरे में AC चलता था, जबकि सर्दियों में उसे ठंड से बचाने के लिए हीटर लगाया जाता था। सुबह उसे दूध और अनार के दाने दिए जाते थे। दोपहर के भोजन में दाल, रोटी, सब्जी और चटनी शामिल होती थी।
राजेश और शबिस्ता का कहना था कि चुनमुन उनके बेटे जैसा था, इसलिए उसकी जरूरतों का पूरा ध्यान रखना स्वाभाविक था। घर में उसके लिए अलग जगह और नियमित देखभाल का इंतजाम किया गया था। चुनमुन की इसी असाधारण जिंदगी के कारण उसकी कहानी लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी।
चुनमुन की शादी भी हुई धूमधाम से
चुनमुन की जिंदगी का एक और खास पड़ाव साल 2010 में आया, जब राजेश और शबिस्ता ने उसकी शादी बिट्टी नाम की बंदरिया से कराई। इस शादी को परिवार ने उत्सव की तरह मनाया। बताया जाता है कि बाद के वर्षों में चुनमुन और बिट्टी की शादी की सालगिरह पर भी पार्टी रखी जाती थी।
इससे साफ था कि दंपती के लिए चुनमुन केवल घर में रखा जानवर नहीं था। उसकी खुशियां और रोजमर्रा की जिंदगी उनके पारिवारिक जीवन का हिस्सा बन चुकी थीं। बिट्टी के आने से चुनमुन को भी साथी मिला और घर में उसकी मौजूदगी ने परिवार के माहौल को और खास बना दिया।
कारोबार में बरकत का श्रेय भी चुनमुन को
राजेश का मानना था कि चुनमुन के घर आने के बाद उनके कारोबार में बरकत हुई और परिवार में समृद्धि आई। इसी लगाव और विश्वास के चलते उन्होंने अपने घर का नाम ‘चुनमुन हाउस’ रख दिया। चुनमुन उनके लिए शुभता और खुशियों का प्रतीक बन गया था।
हालांकि, बंदर को घर में रखने को लेकर कानूनी सवाल भी उठे। एक डॉक्टर ने दंपती को बताया था कि बंदर को इस तरह पालना परेशानी का कारण बन सकता है। इस बात से राजेश और शबिस्ता भावुक हो गए। कुछ खबरों में यह भी बताया गया कि चुनमुन के दांत घिसवाए गए थे, ताकि वह किसी को काट न सके। इस तरह की जानकारी को चुनमुन की कहानी से जुड़ी रिपोर्टों के रूप में ही देखा जाना चाहिए; वन्यजीवों को रखने से जुड़े नियम और परिस्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं।
मौत के बाद घर में बना मंदिर
चुनमुन की मौत के बाद शबिस्ता ने घर में उसके लिए मंदिर बनवाया। वहां राम, लक्ष्मण और सीता की मूर्तियों के साथ चुनमुन की मूर्ति भी स्थापित की गई। इस अवसर पर प्राण-प्रतिष्ठा और भंडारे का आयोजन किए जाने की बात सामने आई थी। यह कदम दंपती के लिए चुनमुन के प्रति उनके गहरे प्रेम और जुड़ाव का प्रतीक था।
चुनमुन की कहानी का सबसे भावुक पहलू उसकी संपत्ति से जुड़ा फैसला भी है। खबरों के मुताबिक, राजेश और शबिस्ता ने अपनी संपत्ति चुनमुन के नाम करने की वसीयत तैयार की थी। इस वजह से उसे अक्सर ‘करोड़पति बंदर’ कहा गया। हालांकि, संपत्ति के वास्तविक मूल्य और वसीयत की कानूनी स्थिति के बारे में उपलब्ध विवरणों को सावधानी से समझना चाहिए।
राजेश और शबिस्ता के लिए चुनमुन उस समय परिवार बना, जब वे खुद को अकेला महसूस कर रहे थे। उसकी कहानी सिर्फ एक अनोखे पालतू बंदर की नहीं, बल्कि उस रिश्ते की भी है जिसमें अपनापन, देखभाल और भावनात्मक सहारा शामिल था। इसी वजह से करोड़पति बंदर चुनमुन की कहानी आज भी लोगों को हैरान करने के साथ-साथ भावुक कर देती है।























