सितंबर का महीना आते ही मौसम में बदलाव होने लगता है, जो पशुपालकों के लिए चिंता का विषय बन जाता है। खासकर दुधारू पशुओं जैसे गाय और भैंस की सेहत पर इस परिवर्तन का गहरा प्रभाव पड़ता है। इस मौसम में पेट के कीड़े, चिचड़ी-किलनी, गलघोंटू, लंगड़ा बुखार और खुरपका-मुंहपका जैसी संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
यदि इन बीमारियों का समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो न केवल पशु की सेहत खराब हो सकती है, बल्कि दूध उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है। इस लेख में हम आपको बताने जा रहे हैं कि मौसम बदलने के साथ पशुपालकों को किन सावधानियों का ध्यान रखना चाहिए और पशु स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के उपाय क्या हैं।
मौसम परिवर्तन और पशु स्वास्थ्य पर प्रभाव
मौसम में बदलाव पशु स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाता है। बरसात के बाद जब मौसम सूखा और ठंडा होने लगता है, तो पेट के कीड़े, चिचड़ी-किलनी और संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ये बीमारियां पशु की प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर देती हैं, जिससे वे कमजोर हो जाते हैं और दूध उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। विशेष रूप से, गलघोंटू, लंगड़ा बुखार और खुरपका-मुंहपका जैसी बीमारियां इस समय अधिक देखी जाती हैं, जो पशु की जीवन रक्षा के लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं।
पेट के कीड़ों से बचाव के उपाय
पेट के कीड़े पशुओं की सेहत को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं। ये कीड़े पशु के पेट में पलते हैं और पोषक तत्वों का अवशोषण रोकते हैं, जिससे पशु कमजोर हो जाता है और दूध उत्पादन घटने लगता है। पशुपालकों को चाहिए कि वह समय-समय पर पशु का डीवॉर्मिंग करें।
यह प्रक्रिया पशु चिकित्सक की सलाह पर ही करनी चाहिए, क्योंकि गाभिन और खाली पशुओं के लिए दवाओं की मात्रा अलग हो सकती है। पेट के कीड़ों से बचाव के लिए नियमित डीवॉर्मिंग से पशु की सेहत बेहतर रहती है और दूध का उत्पादन भी बढ़ता है।
चिचड़ी-किलनी और मच्छरों से सुरक्षा
बारिश के बाद पशुशाला में चिपकी हुई चिचड़ी और किलनी खून चूसकर पशु को कमजोर कर देती हैं। इसके अलावा, बारिश के बाद मच्छरों की संख्या भी बढ़ जाती है, जो पशु के शरीर पर संक्रमण का खतरा बढ़ाते हैं। पशुपालकों को चाहिए कि पशुशाला में उचित उपचार और दवाओं का छिड़काव किया जाए।
पशु के शरीर पर कीटाणुनाशक दवाओं का प्रयोग करें और पशुओं की नियमित साफ-सफाई का ध्यान रखें। बाड़े की सफाई और सूखे स्थान बनाना भी इन कीटाणुओं से बचाव में मदद करता है।
संक्रामक बीमारियों का समय पर टीकाकरण
इस मौसम में गलघोंटू, लंगड़ा बुखार और खुरपका-मुंहपका जैसी संक्रामक बीमारियां फैलने का खतरा रहता है। यदि पशु का टीकाकरण मानसून से पहले नहीं किया गया है, तो तुरंत किया जाना चाहिए। समय पर टीकाकरण पशु को गंभीर बीमारियों से सुरक्षित रखता है और दूध उत्पादन को स्थिर बनाए रखता है। पशुपालकों को चाहिए कि वे अपने पशुओं का नियमित टीकाकरण कराएं और किसी भी लक्षण के दिखने पर तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें।
हरे चारे की कमी से निपटने की तैयारी
सितंबर के बाद ज्वार, बाजरा और मक्का जैसे खरीफ के हरे चारे की उपलब्धता कम हो जाती है। वहीं, सर्दी के चारे जैसे रिजका, जई और बरसीम की बुवाई में समय लगता है। यदि उचित समय पर चारे की व्यवस्था नहीं की गई, तो दूध उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
ऐसी स्थिति में, यदि खेत में ज्वार, बाजरा या मक्का खड़ा है, तो उसे काटकर साइलेज बनाना और सुरक्षित रखना फायदेमंद रहेगा। साथ ही, इस महीने के अंत तक बरसीम, जई और रिजका की बुवाई की योजना बनाना जरूरी है। पशुपालकों को चाहिए कि वे अपने चारे का संग्रह पहले से ही कर लें ताकि मौसम के बदलाव के समय में दूध उत्पादन प्रभावित न हो।
सावधानियों और देखभाल के उपाय
- पशु चिकित्सक से सलाह लेकर नियमित डीवॉर्मिंग और टीकाकरण कराएं।
- पशुशाला की सफाई और सूखा स्थान बनाना जरूरी है।
- पशु शरीर पर कीटाणुनाशक दवाओं का छिड़काव करें।
- पशुओं को साफ और सूखे चारे का ही सेवन कराएं।
- बारिश के मौसम में पशु को जलजनित रोगों से बचाने के लिए उचित उपाय करें।
- खेतों में हरे चारे की समय पर कटाई और संग्रह सुनिश्चित करें।
- पशु की देखभाल में लापरवाही न करें, विशेषकर मौसम परिवर्तन के समय।


























