ग्रेटर नोएडा स्थित कुलेसरा इलाके के पास बहने वाली हिंडन नदी का हाल इन दिनों बेहद चिंताजनक बन गया है। एक समय पर यह नदी क्षेत्र की जीवन रेखा मानी जाती थी, लेकिन आज इसका पानी इतना जहरीला हो चुका है कि इसके संपर्क में आने मात्र से ही इंसानों में गंभीर त्वचा रोग (Skin Diseases) का खतरा मंडराने लगता है। यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) की हालिया रिपोर्ट इस तथ्य को कठोर तौर पर साबित करती है कि हिंडन नदी का पानी अब सिर्फ जहरीला नहीं, बल्कि जीवों के लिए घातक बन चुका है।
विज्ञान और आंकड़े बयां करते हैं हिंडन का दर्द
जून माह की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, कुलेसरा के समीप हिंडन नदी में ‘बायो केमिकल ऑक्सीजन डिमांड’ (BOD) यानी जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग 82 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई है। आमतौर पर नदी के पानी में BOD का स्तर कम होना चाहिए। जब BOD बढ़ता है, तो इसका सीधा मतलब है कि पानी में मौजूद जहरीले तत्वों और कचरे को जलायमान करने के लिए ऑक्सीजन की खपत अत्यधिक हो रही है। इसके चलते पानी में जीवन के लिए आवश्यक ऑक्सीजन का स्तर न्यूनतम से भी नीचे चला जाता है।
इतना ही नहीं, पानी की गुणवत्ता जांचने वाले एक और महत्वपूर्ण पैरामीटर ‘कोलीफॉर्म बैक्टीरिया’ (Coliform Bacteria) ने भी सबके होश उड़ा दिए हैं। कुलेसरा में टोटल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा 92 लाख प्रति 100 मिलीलीटर पाई गई, जबकि फिकल कोलीफॉर्म (मल मूत्र से आने वाले बैक्टीरिया) 35 लाख प्रति 100 मिलीलीटर दर्ज किए गए। ये आंकड़े पूरे उत्तर प्रदेश की किसी भी नदी में दर्ज किए गए सबसे उच्चतम स्तर हैं।
ई-श्रेणीका शर्मनाक रिकॉर्ड
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नदियों के पानी को पांच श्रेणियों (A से E) में बांटता है, जहां ‘E’ श्रेणी सबसे खराब और अयोग्य पानी को दर्शाती है। यूपी की हिंडन, काली नदी, गोमती और वरुणा चार सबसे प्रदूषित नदियां हैं, लेकिन हिंडन नदी का रिकॉर्ड सबसे शर्मनाक है। गोमती और वरुणा में कुछ स्थानों पर पानी की श्रेणी सुधरते भी दिखती है, लेकिन हिंडन नदी का पानी जिस जिले से भी बहता है, वहां लगातार ‘E’ श्रेणी में ही रिकॉर्ड किया जा रहा है।
जलीव जीवों के साथ-साथ इंसानों पर भी मंडरा रहा खतरा
हिंडन नदी में ऑक्सीजन के स्तर में भारी कमी के चलते जलीय जीवों (Aquatic Life) का बड़े पैमाने पर विनाश हो रहा है। मछलियों समेत अन्य जलचर जीव ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। रिपोर्ट से पता चलता है कि इस जिले का लगभग 22 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रति दिन) गंदा और उपचारित न किया गया पानी सीधे हिंडन नदी में गिर रहा है, जो इस त्रासदी का प्रमुख कारण बना हुआ है।
लेकिन सबसे बड़ी परेशानी यह है कि यह प्रदूषण अब सिर्फ नदी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों की सेहत पर सीधे दिख रहा है। कुलेसरा के आरोग्य मंदिर (अस्पताल) से मिले आंकड़े भयावह हैं। हर महीने लगभग 400 से अधिक मरीज ओपीडी में आते हैं, जिनमें से करीब 100 मरीज सिर्फ त्वचा संक्रमण (Skin Infection) के शिकार होते हैं।
स्वास्थ्य विभाग के सर्वे ने खोली पोल
स्थिति की गंभीरता को समझने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा हिंडन नदी के किनारे बसी कॉलोनियों में मानसून के दौरान विशेष स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन किया गया। वर्ष 2023 और 2024 में आयोजित इन शिविरों में 2500 से अधिक लोगों की स्वास्थ्य जांच की गई। इस जांच के नतीजे चौंकाने वाले थे—इनमें से 800 से अधिक लोग त्वचा संक्रमण के रोगी निकले। यानी लगभग 30 प्रतिशत आबादी इस जहरीले पानी की वजह से त्वचा की बीमारियों से जूझ रही है। नदी से उठने वाली दुर्गंध और हवा के जरिए फैलने वाले जीवाणु लोगों के लिए समान रूप से खतरनाक साबित हो रहे हैं।
पश्चिमी यूपी की दूसरी सबसे प्रदूषित नदी ‘काली’
हिंडन के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा प्रदूषित नदी काली नदी है। बुलंदशहर में काली नदी के पानी की जांच में BOD 52 मिलीग्राम प्रति लीटर और टोटल कोलीफॉर्म 39 लाख प्रति 100 मिलीलीटर पाया गया। हालांकि, ये आंकड़े भी चिंताजनक हैं, लेकिन कुलेसरा वाले हिंडन नदी के आंकड़ों के आगे कहीं नहीं टिकते।
प्रशासन का रवैया और भविष्य
ग्रेटर नोएडा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी विकास मिश्रा का कहना है कि हिंडन नदी के पानी की नियमित रूप से जांच की जा रही है। गंदे पानी को नदी में बहाने रोकने और अन्य उपायों के लिए सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर काम किया जा रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
अगर 22 एमएलडी गंदा पानी रोका नहीं गया और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (STP) को पूरी क्षमता से नहीं चलाया गया, तो आने वाले समय में हिंडन नदी के किनारे बसे लोगों के लिए यह स्थिति और भी विकराल हो सकती है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला प्रशासन को चाहिए कि वे कागजों पर काम करने के बजाय गंदे पानी के निस्तारण पर तत्काल और सख्त प्रतिबंध लगाएं, ताकि आसपास के गांवों और कॉलोनियों के लोगों को इस जहरीले पानी की परेशानी से निजात मिल सके।

























