Delhi News: तकनीक के इस दौर में जहां एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) हमारे जीवन को हर मोर्चे पर आसान बना रहा है, वहीं अब यह तकनीक मानवीय जान को खतरे से बचाने में भी अहम भूमिका निभाने जा रही है। सीवर लाइनों और मैनहोल की सफाई के दौरान होने वाली मौतों पर अंकुश लगाने के लिए अब पारंपरिक तरीकों को त्याग दिया जाएगा। देश के वरिष्ठ न्यायविद और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता डॉ. भारत नगर ने साफ तौर पर कहा है कि मैनहोल और सीवर में मानव प्रवेश पूरी तरह से बंद होना चाहिए और इस काम के लिए केवल एआई आधारित रोबोट्स का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
यह बात उन्होंने हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी में स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (PCI) में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में कही। यहां पुस्तक “एल्गोरिदम एंड एम्बिशन: फ्रॉम कैंपस टू सी-सूट” के विमोचन के मौके पर नीति निर्माता, शिक्षाविद् और तकनीकी विशेषज्ञों ने एक मंच पर बैठकर एआई के भविष्य और उसके व्यावहारिक उपयोग पर गहन चर्चा की।

कानूनन प्रतिबंधित है मानव प्रवेश, फिर भी जारी है खेल
अपने संबोधन में डॉ. भारत नगर ने सबसे पहले देश के कानूनी ढांचे को याद दिलाया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2013 में बने ‘मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड उनके पुनर्वास अधिनियम’ के तहत, साथ ही सुप्रीम कोर्ट के बार-बार दिए गए सख्त निर्देशों के अनुसार, सीवर और सीपेज टैंकों में बिना सुरक्षा उपकरणों के मनुष्यों को भेजना पूरी तरह से अवैध है।
लेकिन दुख की बात यह है कि ठेकेदार व्यवस्था की खामियों और सरकारी अधिकारियों की लापरवाही के चलते आज भी गरीब और कमजोर वर्गों के लोगों को बिना किसी सुरक्षा कवच के जहरीली गैसों से भरे इन गड्ढों में उतरना पड़ रहा है। इसका नतीजा होता है मौत या गंभीर बीमारियां। डॉ. नगर ने नगर निकायों को चेतावनी दी कि अब मैनुअल श्रम पर निर्भरता खत्म करनी होगी।
एआई और रोबोट्स कैसे करेंगे काम?
डॉ. नगर ने एआई तकनीक की क्षमता को समझाते हुए बताया कि आज की तकनीक इतनी आगे बढ़ चुकी है कि खतरनाक कचरे की पहचान करने के लिए किसी इंसान को उस जगह जाने की जरूरत नहीं है। एआई आधारित टूल्स और कैमरे दूर से ही भूमिगत सीवरों, बंद कमरों या खुले क्षेत्रों में मौजूद जहरीले कचरे को स्कैन कर लेते हैं।
यह तकनीक यह पहचान सकती है कि कचरा ठोस (सॉलिड) है, तरल (लिक्विड) है या फिर जहरीली गैस का रूप ले चुका है। पहचान के बाद, विशेष तौर पर डिजाइन किए गए एआई रोबोट उस क्षेत्र में जाकर कचरे को सुरक्षित तरीके से बाहर निकालते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी इंसान की जान को खतरा नहीं रहता।
यूपी और गुजरात बन रहे हैं मिसाल
इस बात को सिर्फ सिद्धांत तक सीमित न रखते हुए डॉ. नगर ने कुछ असली उदाहरण भी दिए। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में कुछ निजी कंपनियां और स्टार्टअप्स ने इस दिशा में काम शुरू कर दिया है। यह कंपनियां एआई रोबोट्स का इस्तेमाल करके खतरनाक कचरे के प्रबंधन का एक सफल और सुरक्षित मॉडल सामने रख रही हैं। उन्होंने सरकारों से इन मॉडल्स को अपनाने की अपील की ताकि पूरे देश में इसे लागू किया जा सके।
खतरनाक कचरे के प्रबंधन के लिए विशेष अभियान की जरूरत
डॉ. भारत नगर ने केंद्र और राज्य सरकारों से एक व्यापक अभियान चलाने की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और औद्योगिकरण के चलते खतरनाक कचरे का निस्तारण एक बड़ी चुनौती बन गया है। यह कचरा सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि पर्यावरण और जलस्रोतों के लिए भी गंभीर खतरा है। इसके सुरक्षित उपचार और निपटान के लिए आधुनिक एआई तकनीक को अपनाना अब मात्र विकल्प नहीं, बल्कि एक जरूरत बन चुका है।
फ्रॉम कैंपस टू सी-सूट” पुस्तक का विशेषत्व
इस कार्यक्रम का मुख्य केंद्र पुस्तक का विमोचन था। यह किताब आज के उस दौर में एक मार्गदर्शक के रूप में सामने आई है, जहां एआई हर एक पेशे को बदल रहा है। पुस्तक में विस्तार से बताया गया है कि छात्रों को कैंपस से लेकर कॉर्पोरेट दुनिया (सी-सूट) तक के सफर में एआई के अनुसार खुद को कैसे ढालना है।फैसले लेने की प्रक्रिया में अब डेटा और एल्गोरिदम की भूमिका कैसे बढ़ गई है। कंपनियां और संगठन एआई को अपनाकर अपनी कार्यप्रणाली को कैसे अधिक प्रभावी बना सकते हैं।
सिर्फ तकनीक नहीं, सामाजिक बदलाव का हथियार
इस विमोचन समारोह में मौजूद अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने स्पष्ट किया कि एआई का दायरा अब सिर्फ कंप्यूटर या सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं रह गया है। चाहे वो शिक्षा क्षेत्र हो, जहां बच्चों को पर्सनलाइज्ड लर्निंग मिल रही है, चाहे शासन व्यवस्था हो जहां सरकारी योजनाओं को जनता तक पहुंचाने में तेजी आई है, या फिर उद्योग जगत हो—हर जगह एआई भविष्य की रीढ़ की हड्डी बनने वाला है।























