ब्रिटिश भारत में पेट्रोल कहां से आता था? जानिए तेल कारोबार का इतिहास

जानिए ब्रिटिश भारत में पेट्रोल और केरोसिन कहां से आते थे, बर्मा ऑयल कंपनी की क्या भूमिका थी और डिगबोई तेल क्षेत्र ने भारत के तेल उद्योग को कैसे आकार दिया।

अंग्रेज भारत में पेट्रोल आखिर कहां से मंगवाते थे?

HIGHLIGHTS

  • भारत की पहली रिफाइनरी की दिलचस्प कहानी जानिए
  • बर्मा ऑयल कंपनी ने भारत में कैसे जमाया दबदबा?
  • अंग्रेजी राज में पेट्रोल का कारोबार कैसे चलता था?
  • भारत में पहला पेट्रोल पंप कब और कहां खुला?

आज ईंधन की कीमतों और तेल आयात पर चर्चा होते ही भारत की विदेशी निर्भरता का सवाल उठता है। लेकिन ब्रिटिश शासन के दौर में पेट्रोल और मिट्टी का तेल कहां से आता था? उस समय तेल का आयात, भंडारण और वितरण कौन संभालता था? जवाब सिर्फ विदेशी तेल क्षेत्रों में नहीं, बल्कि बर्मा, असम और कुछ बड़ी कंपनियों के कारोबारी नेटवर्क में भी मिलता है।

19वीं सदी के आखिर और 20वीं सदी की शुरुआत में भारत में मोटरगाड़ियां आम नहीं थीं। फिर भी केरोसिन की मांग काफी थी, क्योंकि इसका इस्तेमाल घरों में रोशनी और कई अन्य जरूरतों के लिए होता था। पेट्रोल की खपत धीरे-धीरे बढ़ रही थी। देश में कुछ तेल उत्पादन शुरू हो चुका था, पर वह बढ़ती मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं था। इसलिए ब्रिटिश भारत में ईंधन की आपूर्ति घरेलू उत्पादन और आयात—दोनों पर निर्भर थी।

ब्रिटिश भारत में पेट्रोल और केरोसिन कहां से आते थे?

भारत के तेल कारोबार में तत्कालीन बर्मा—आज का म्यांमार—की अहम भूमिका थी। वहां के तेल क्षेत्रों से कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद मिलते थे। उस समय बर्मा ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा था, इसलिए वहां से भारत तक तेल पहुंचाने के लिए कारोबारी और परिवहन संबंध विकसित करना अपेक्षाकृत आसान था।

इसके अलावा भारत में विदेशों से परिष्कृत तेल और केरोसिन भी मंगाया जाता था। तेल के स्रोत समय के साथ बदलते रहे और आपूर्ति व्यापारिक परिस्थितियों पर निर्भर करती थी। इसलिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि पूरा ईंधन केवल एक देश से आता था। भारत के अपने तेल क्षेत्रों और रिफाइनरी के बावजूद आयात जरूरी बना रहा।

तेल कारोबार पर किन कंपनियों का दबदबा था?

ब्रिटिश भारत में तेल का कारोबार कुछ बड़ी विदेशी कंपनियों के हाथों में केंद्रित था। इनमें बर्मा ऑयल कंपनी प्रमुख थी। कंपनी ने बर्मा के अलावा असम के तेल क्षेत्रों में भी काम किया और उत्पादन, रिफाइनिंग तथा आपूर्ति के नेटवर्क का विस्तार किया।

बाजार में एशियाटिक पेट्रोलियम की भी अहम मौजूदगी थी। 1920 के दशक के आखिर में बर्मा ऑयल और एशियाटिक पेट्रोलियम के कारोबारी हितों के मेल से बर्मा-शेल के नाम से जानी जाने वाली कंपनी का गठन हुआ। इस साझेदारी ने तेल उत्पादों के आयात और वितरण को संगठित करने में भूमिका निभाई। उस दौर में कैल्टेक्स और स्टैंडर्ड वैक्यूम जैसी विदेशी कंपनियां भी भारतीय बाजार में सक्रिय थीं।

इन कंपनियों का काम केवल तेल बेचना नहीं था। वे आपूर्ति, भंडारण, परिवहन और शहरों में वितरण की व्यवस्था भी संभालती थीं। इस तरह ईंधन का कारोबार उत्पादन स्थल से लेकर उपभोक्ता तक एक बड़े व्यावसायिक तंत्र के जरिए चलता था।

डिगबोई में तेल की खोज का इतिहास

भारत में तेल की खोज का एक अहम अध्याय असम से जुड़ा है। 19वीं सदी में असम के जंगलों में तेल के संकेत मिले। डिगबोई क्षेत्र में तेल मिलने के बाद वहां व्यावसायिक उत्पादन की दिशा में काम आगे बढ़ा। 1889 को डिगबोई में तेल कुएं की सफल शुरुआत से जोड़ा जाता है, हालांकि शुरुआती खोज और उत्पादन का इतिहास कई चरणों में विकसित हुआ था।

डिगबोई के नाम को लेकर एक लोकप्रिय कहानी भी सुनाई जाती है। कहा जाता है कि वहां काम कर रहे ब्रिटिश इंजीनियरों ने मजदूरों से “डिग, बॉय, डिग” यानी “खोदते रहो” कहा था और इसी से जगह का नाम डिगबोई पड़ा। यह किस्सा लंबे समय से प्रचलित है, लेकिन इसे नाम की पक्की ऐतिहासिक व्याख्या मानने के बजाय लोकप्रिय लोककथा के रूप में देखना बेहतर है।

डिगबोई रिफाइनरी क्यों बनी खास?

तेल उत्पादन के साथ उसे उपयोगी ईंधन में बदलने के लिए रिफाइनरी की जरूरत थी। डिगबोई में 1901 के आसपास रिफाइनरी शुरू हुई, जिसे भारत की सबसे पुरानी चालू रिफाइनरियों में गिना जाता है। इसे भारतीय तेल उद्योग के शुरुआती इतिहास का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।

हालांकि, डिगबोई का उत्पादन पूरे ब्रिटिश भारत की मांग के लिए पर्याप्त नहीं था। देश का आकार बड़ा था और तेल की जरूरतें बढ़ रही थीं। इसलिए स्थानीय उत्पादन के बावजूद आयात और दूसरे क्षेत्रों से आपूर्ति जारी रही। यही वजह है कि ब्रिटिश भारत का तेल बाजार घरेलू उत्पादन और विदेशी कंपनियों के नेटवर्क—दोनों पर टिका था।

भारत में पहला पेट्रोल पंप कब शुरू हुआ?

शुरुआत में पेट्रोल अक्सर टिन के डिब्बों या कैन में बेचा जाता था। जैसे-जैसे मोटरगाड़ियों की संख्या बढ़ी, ईंधन भरने की व्यवस्थित सुविधाओं की जरूरत महसूस हुई। 1920 के दशक में बड़े शहरों में पेट्रोल पंपों का चलन बढ़ने लगा। मुंबई के लैमिंगटन रोड पर 1928 में स्थापित पंप को अक्सर भारत के शुरुआती आधिकारिक पेट्रोल पंपों में गिना जाता है। “देश का पहला” कहे जाने वाले ऐसे दावों में स्रोतों के अनुसार कुछ अंतर मिल सकता है।

Sandhya Samay News

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