दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर मैदान से लद्दाख के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और इनोवेटर सोनम वांगचुक को पुलिस द्वारा जबरन हटाकर अस्पताल ले जाने के मामले ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। इस कार्रवाई पर विपक्ष के साथ-साथ आम नागरिकों में भी भारी रोष देखा जा रहा है। इसी कड़ी में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने केंद्र भाजपा सरकार और विशेष रूप से गृह मंत्रालय पर तीखा और सीधा हमला बोला है।
नए पुलिस कमिश्नर की पहली ‘कार्रवाई’ ने उठाए सवाल
पवन खेड़ा ने अपनी प्रतिक्रिया के शुरुआती हिस्से में दिल्ली पुलिस के प्रशासनिक बदलाव पर सीधा प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि कल ही गृह मंत्रालय ने दिल्ली पुलिस के पुराने कमिश्नर को एक झटके में हटा दिया और नए कमिश्नर की नियुक्ति की। यह कोई संयोग नहीं है कि नए कमिश्नर के कुर्सी संभालने के बाद उनकी पहली बड़ी कार्रवाई एक शांतिपूर्ण धरने को बलपूर्वक खत्म करना रही।
पवन खेड़ा ने आगे स्पष्ट किया कि दिल्ली पुलिस सीधे तौर पर केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीनस्थ काम करती है। ऐसे में यह पूरी घटना किसी स्थानीय प्रशासन के फैसले से ज्यादा केंद्र सरकार के निर्देशों का परिणाम है। उन्होंने कहा कि अगर नए पुलिस प्रमुख की पहली प्राथमिकता शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज या जबरन उठाना है, तो यह देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक गंभीर चेतावनी है। इससे साफ जाहिर होता है कि सरकार संविधान के मूल्यों से ज्यादा अपने राजनीतिक मास्टर्स के आदेशों को तवज्जो दे रही है।
संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों पर सरकार का प्रहार
कांग्रेस नेता ने अपने बयान में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 का जिक्र करते हुए कहा कि हर भारतीय नागरिक को अपनी बात रखने, असहमति जताने और शांतिपूर्ण ढंग से विरोध प्रदर्शन करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। लेकिन वर्तमान में जिस तरह से गृह मंत्रालय के इशारे पर प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की जा रही है, उससे यह लगता है कि सरकार इन लोकतांत्रिक अधिकारों को खत्म करने पर तुली हुई है।
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि सोनम वांगचुक कोई आतंकवादी नहीं हैं, बल्कि वे एक सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो लद्दाख के लोगों के हितों और पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए अनशन पर बैठे थे। उन्हें जबरन धरनास्थल से हटाकर अस्पताल ले जाना लोकतंत्र की बेइज्जती है।
पहलवानों और पूर्व सैनिकों के बाद अब वांगचुक का नंबर
पवन खेड़ा ने मोदी सरकार के एक विशेष पैटर्न को सामने रखा। उन्होंने कहा कि यह पहला मौका नहीं है जब सरकार ने शांतिपूर्ण विरोध को कुचलने की कोशिश की है। उन्होंने याद दिलाया कि कुछ समय पहले दिल्ली के ही जंतर-मंतर पर ओलंपिक पदक विजेता महिला पहलवानों के साथ बहुत अमर्यादित तरीके से व्यवहार किया गया था। उस समय भी दिल्ली पुलिस ने धरनास्थल पर आग लगाने और पहलवानों को घसीटने का काम किया था।
इसके अलावा, उन्होंने ‘अग्निपथ योजना’ और अन्य सैन्य मुद्दों को लेकर पूर्व सैनिकों (Ex-Servicemen) के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर भी सरकार द्वारा कड़ाई दिखाने का उल्लेख किया। खेड़ा ने कहा, “पहले देश की बेटियों (पहलवानों) के साथ, फिर देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले पूर्व सैनिकों के साथ और अब सोनम वांगचुक जैसे लोगों के साथ यही सलूक हो रहा है। यह संदेश साफ है कि भाजपा सरकार किसी की भी आवाज को सुनने को तैयार नहीं है।”
लोकतांत्रिक अधिकार या कानून-व्यवस्था की समस्या?
पवन खेड़ा ने अपने बयान के अंत में केंद्र सरकार की सोच पर सवालिया निशान लगाया। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी शांतिपूर्ण विरोध को कभी लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में नहीं देखती, बल्कि उसे हमेशा से ‘कानून-व्यवस्था की समस्या’ के तौर पर पेश करती है।
उन्होंने आगे कहा कि जब कोई विपक्षी पार्टी या आम नागरिक सड़क पर उतरता है, तो सरकार को यह बताना चाहिए कि उनकी मांगें क्यों गलत हैं, लेकिन सरकार बहस से भागती है और सीधा डंडे का सहारा लेती है। यह बेहद दुखद है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में नागरिकों के बुनियादी अधिकारों को इस तरह कुचला जा रहा है।

























