वोटर आईडी से पहले लोग कैसे डालते थे वोट? जानें

भारत में चुनावी पहचान की व्यवस्था समय के साथ बदली है। मतदाता सूची से शुरू हुआ यह सफर फोटो पहचान पत्र और आधुनिक चुनावी तकनीक तक पहुंचा। वोटर आईडी कार्ड का इतिहास समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि पहले मतदाताओं की पहचान कैसे की जाती थी और चुनाव आयोग ने फोटो कार्ड की जरूरत क्यों महसूस की।

बूथ पर नाम बताकर मिलता था बैलेट, जानें पूरा तरीका

HIGHLIGHTS

  • बिना फोटो पहचान पत्र के कैसे होता था मतदान?
  • वोटर आईडी का इतिहास जानकर चौंक जाएंगे आप
  • मतदाता सूची से होती थी पहचान, ऐसे पड़ता था वोट
  • 1993 से पहले वोट डालने का तरीका क्या था?

आज वोटर आईडी कार्ड को चुनाव के दौरान पहचान के अहम दस्तावेजों में गिना जाता है। लेकिन क्या वोट डालने के लिए हमेशा इसकी जरूरत होती थी? भारत में फोटो वाले वोटर पहचान पत्र आने से पहले चुनाव मुख्य रूप से मतदाता सूची, स्थानीय पहचान और मतदान केंद्र पर मौजूद अधिकारियों की जांच पर निर्भर थे। उस दौर में न डिजिटल मतदाता डेटाबेस था, न हर मतदाता के पास सरकार की ओर से जारी फोटो पहचान पत्र।

भारत में चुनावी पहचान की व्यवस्था समय के साथ बदली है। मतदाता सूची से शुरू हुआ यह सफर फोटो पहचान पत्र और आधुनिक चुनावी तकनीक तक पहुंचा। वोटर आईडी कार्ड का इतिहास समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि पहले मतदाताओं की पहचान कैसे की जाती थी और चुनाव आयोग ने फोटो कार्ड की जरूरत क्यों महसूस की।

मतदाता सूची थी पहचान का मुख्य आधार

हर चुनाव से पहले चुनावी अधिकारी मतदाता सूची तैयार करते और उसमें योग्य मतदाताओं के नाम दर्ज करते थे। इसके लिए अधिकारी घरों और मोहल्लों में जाकर लोगों से जानकारी जुटाते थे। मतदाता का नाम, परिवार से जुड़ी जानकारी और पता सूची में दर्ज किया जाता था।

मतदान केंद्र पर पहुंचने के बाद सबसे पहले मतदाता सूची में व्यक्ति का नाम खोजा जाता था। यदि नाम सूची में मौजूद होता, तो वह वोट देने के लिए पंजीकृत माना जाता था। चुनाव अधिकारी और राजनीतिक दलों के पोलिंग एजेंट सूची के आधार पर यह जांच करते थे कि व्यक्ति का नाम दर्ज है या नहीं।

इस व्यवस्था में आज की तरह डिजिटल रिकॉर्ड या एक समान सरकारी फोटो पहचान पत्र की भूमिका नहीं थी। चुनावी प्रक्रिया काफी हद तक कागजी रिकॉर्ड और मतदान केंद्र पर मौजूद लोगों की जांच पर आधारित थी।

वोटर की पहचान कैसे जांची जाती थी?

मतदान केंद्र पर मतदाता अपना नाम बताता था। जरूरत पड़ने पर पिता या परिवार के किसी सदस्य का नाम और मोहल्ले का पता भी बताया जा सकता था। अधिकारी मतदाता सूची में दर्ज विवरण से जानकारी का मिलान करते थे।

गांवों और छोटे कस्बों में स्थानीय पहचान भी मददगार होती थी। कई बार पोलिंग एजेंट इलाके के लोगों को जानते थे और किसी मतदाता की पहचान की पुष्टि कर सकते थे। हालांकि, यह तरीका हर जगह समान रूप से भरोसेमंद नहीं था। शहरों में, जहां मतदाता एक-दूसरे को कम जानते थे, पहचान की जांच अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती थी।

पहचान की पुष्टि होने के बाद मतदाता की उंगली पर अमिट स्याही लगाई जाती थी। इसका उद्देश्य यह दिखाना था कि व्यक्ति वोट डाल चुका है, ताकि वह दोबारा मतदान न कर सके। यानी उस समय पहचान की जांच और दोहरे मतदान को रोकने के लिए अलग-अलग उपाय अपनाए जाते थे।

बैलेट पेपर और चुनाव चिह्न से होती थी वोटिंग

पहचान की जांच के बाद मतदाता को बैलेट पेपर दिया जाता था। वह अपनी पसंद के उम्मीदवार के चुनाव चिह्न के सामने निशान लगाकर बैलेट बॉक्स में डालता था। शुरुआती चुनावों में चुनाव चिह्न खास तौर पर महत्वपूर्ण थे, क्योंकि देश में साक्षरता का स्तर कम था और सभी मतदाता उम्मीदवारों के नाम पढ़ने में सक्षम नहीं होते थे।

1951-52 के पहले आम चुनाव में चुनाव चिह्नों ने मतदाताओं को अपने पसंदीदा उम्मीदवार की पहचान करने में मदद की। शुरुआती चुनावों में उम्मीदवारों के लिए अलग-अलग बैलेट बॉक्स का इस्तेमाल भी किया गया था। समय के साथ मतदान की प्रक्रिया में बदलाव हुए और बैलेट पेपर पर चुनाव चिह्न के सामने निशान लगाने की व्यवस्था अधिक प्रचलित हुई।

फोटो वाले वोटर आईडी कार्ड का विचार कब आया?

फोटो पहचान पत्र की जरूरत पर चुनाव आयोग ने 1957 के आम चुनाव के बाद विचार किया। इसका मकसद मतदाता की पहचान को अधिक स्पष्ट बनाना और किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर वोट डालने की आशंका कम करना था। इसके बाद 1960 में कोलकाता के एक निर्वाचन क्षेत्र में फोटो पहचान पत्र से जुड़ा पायलट प्रयोग किया गया। हालांकि, उस समय इसे पूरे देश में लागू करने लायक पूरी तरह सफल व्यवस्था नहीं माना गया।

बाद में 1979 के सिक्किम विधानसभा चुनाव में फोटो वाले पहचान पत्र का इस्तेमाल किया गया। यह चुनावी प्रक्रिया में तस्वीर के जरिए मतदाता की पहचान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। हालांकि, देशभर में ऐसी व्यवस्था लागू होने में अभी समय लगना था।

टी. एन. शेषन के कार्यकाल में बड़ा बदलाव

फोटो वाले मतदाता पहचान पत्र को व्यापक स्तर पर लागू करने की दिशा में 1990 के दशक में तेजी आई। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन के कार्यकाल में चुनावी नियमों के पालन और प्रक्रिया को मजबूत करने पर जोर दिया गया। 1993 में फोटो वाले इलेक्टोरल फोटो आइडेंटिटी कार्ड (EPIC) की शुरुआत देशव्यापी स्तर पर की गई।

इन कार्डों का उद्देश्य मतदान केंद्र पर मतदाता की पहचान की पुष्टि को बेहतर बनाना और किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर वोट डालने की संभावना घटाना था। हालांकि, फोटो पहचान पत्र का होना और मतदाता सूची में नाम होना अलग-अलग बातें हैं। वोट डालने के लिए मतदाता का नाम संबंधित मतदाता सूची में होना जरूरी है; पहचान पत्र का उपयोग पहचान साबित करने के लिए किया जाता है।

पुराने सिस्टम की चुनौतियां

फोटो पहचान पत्र से पहले की व्यवस्था में कई व्यावहारिक कठिनाइयां थीं। कागजी मतदाता सूची में गलती, एक जैसे नाम और स्थानीय पहचान पर निर्भरता के कारण जांच चुनौतीपूर्ण हो सकती थी। किसी मृत या अनुपस्थित मतदाता के नाम पर वोट डालने की कोशिश का जोखिम भी बना रहता था।

कुछ इलाकों में बूथ कैप्चरिंग और मतदाताओं को डराने-धमकाने जैसी घटनाएं भी चुनाव की निष्पक्षता के लिए चुनौती थीं। ऐसे मामलों में केवल मतदाता सूची से नाम मिलाना पर्याप्त सुरक्षा नहीं देता था। फोटो पहचान पत्र ने पहचान की जांच को मजबूत करने में मदद की, हालांकि निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा व्यवस्था, अधिकारियों की निगरानी और मतदाता सूची की शुद्धता भी उतनी ही जरूरी हैं।

मतदाता पहचान का बदलता सफर

भारत में वोटर आईडी कार्ड से पहले मतदान का आधार मतदाता सूची, कागजी रिकॉर्ड और स्थानीय पहचान थी। समय के साथ फोटो पहचान पत्र ने मतदाता की पहचान की पुष्टि को अधिक व्यवस्थित बनाया। फिर भी चुनाव प्रक्रिया का मूल आधार आज भी मतदाता सूची में दर्ज नाम है। इस इतिहास से साफ है कि भरोसेमंद चुनाव के लिए पहचान पत्र के साथ सही मतदाता सूची, निष्पक्ष निगरानी और सुरक्षित मतदान केंद्र—तीनों की अहम भूमिका है।

Sandhya Samay News

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