Supreme Court Hearing SIR: बिहार में चुनाव आयोग द्वारा किए गए विशेष सारांश पुनरीक्षण (Special Summary Revision – SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने साफ तौर पर कहा है कि बिहार में SIR की प्रक्रिया में कोई भी खामी या वैधानिक कमी नहीं है। यह फैसला भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, क्योंकि इस प्रक्रिया को लेकर देशभर में काफी राजनीतिक और कानूनी बहस छिड़ी हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट के इस ‘सुप्रीम’ फैसले से बिहार में मतदाता सूची के शुद्धिकरण को लेकर उठे सवालों पर विराम लग गया है। आइए इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं:
मामला क्या था?
बिहार में चुनाव आयोग द्वारा SIR प्रक्रिया के तहत जिस तरह से मतदाता सूची का सत्यापन किया गया, उसे लेकर कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं में प्रख्यात गैर-सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) समेत कई अन्य लोग शामिल थे।
इन याचिकाओं में मुख्य दावा किया गया था कि चुनाव आयोग के पास संविधान के अनुच्छेद 326 (जो चुनावों में सार्वजनिक निर्वाचन प्रणाली की बात करता है), जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उसके तहत बनाए गए नियमों के दायरे में इतने बड़े स्तर पर SIR कराने का कोई अधिकार नहीं है। याचिकाकर्ताओं की मान्यता थी कि आयोग ने अपनी सीमाओं का उल्लंघन किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनाई यह दलील
इन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने पिछले साल 12 अगस्त से इस मामले की अंतिम सुनवाई शुरू की थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने एक मजबूत टिप्पणी की थी। कोर्ट ने साफ कहा दिया था कि मतदाता सूची में नाम जोड़ना या उसमें से नाम हटाना पूरी तरह से चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका का काम चुनाव आयोग के कामकाज में रोजमर्रा के हस्तक्षेप का नहीं है, जब तक कि प्रक्रिया में कोई खामियां या मनमानी न दिखे। 29 जनवरी को लंबी सुनवाई के बाद पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसके बाद अब यह फैसला आया है।
65 लाख नाम हटाने का मुद्दा और आयोग का बचाव
बिहार में SIR प्रक्रिया का पहला चरण पूरा हो चुका है। इस दौरान सबसे बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ, जब चुनाव आयोग ने SIR के तहत प्रकाशित ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में लगभग 65 लाख लोगों के नाम हटाए जाने की जानकारी दी थी।
इसके पीछे चुनाव आयोग का तर्क क्या था? आयोग के नोटिफिकेशन के अनुसार, एक विशेष शर्त रखी गई थी। उन मतदाताओं को जिनका नाम वर्ष 2002 या 2003 की पुरानी मतदाता सूची में मौजूद नहीं था, उन्हें अपनी वैधता साबित करने के लिए उस समय की सूची में दर्ज किसी व्यक्ति से अपना ‘पैतृक संबंध’ (Paternal Relation) साबित करना अनिवार्य था। जो लोग यह साबित नहीं कर पाए, उनके नाम काटे गए।
याचिकाकर्ताओं ने इसे असंवैधानिक बताया, लेकिन चुनाव आयोग ने अपने बचाव में एक मजबूत तर्क दिया। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि भारत में आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। इन दस्तावेजों के जरिए किसी भी व्यक्ति की नागरिकता की गारंटी नहीं दी जा सकती, इसलिए पैतृक संबंध की जांच आवश्यक थी।
इस फैसले का क्या असर होगा?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं होगा, बल्कि इससे पूरे देश में चुनाव आयोग की शक्तियों को लेकर स्पष्टता आई है।
- ECI को मिली स्वतंत्रता: यह फैसला साबित करता है कि मतदाता सूची का शुद्धिकरण करना आयोग का अधिकार है और सरकारें या अन्य संगठन इसमें बाधा नहीं डाल सकते।
- पहचान पत्रों पर सवाल: आधार और वोटर ID को लेकर चल रही बहस में अदालत के इस रुख ने एक नया पहलू जोड़ दिया है कि ये सिर्फ पहचान के दस्तावेज हैं, नागरिकता के अंतिम प्रमाण नहीं।
- बिहार की राजनीति: बिहार में इस फैसले से विपक्षी दलों को झटका लगा है, जो SIR को लेकर सरकार और आयोग पर लगातार निशाना साध रहे थे। अब आगामी चुनाव उस शुद्ध मतदाता सूची के आधार पर होंगे, जिसमें 65 लाख संदिग्ध नामों को निकाला जा चुका है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लोकतंत्र के सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक कदम माना जा रहा है, जहां ‘जाली मतदाताओं’ को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखने के लिए चुनाव आयोग को पूरी छूट दी गई है। अब बिहार में SIR के अगले चरणों को इसी फैसले के आधार पर आगे बढ़ाया जाएगा।























