कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की वोटर लिस्ट को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। दिल्ली की एक अदालत के ताजा आदेश के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर हमलार बोलना शुरू कर दिया है। भाजपा का सीधा सवाल है कि जब सोनिया गांधी को भारतीय नागरिकता ही नहीं मिली थी, तो उनका नाम मतदाता सूची में किस तरह दर्ज हो गया? पार्टी ने राहुल गांधी से इस मुद्दे पर साफ-साफ जवाब तलब किया है।
दिल्ली कोर्ट का बड़ा आदेश
मामले की ताजा कार्रवाई की बात करें, तो दिल्ली के राउज एवेन्यू स्थित विशेष अदालत ने 21 सितंबर को एक पुराने आदेश को रद्द कर दिया। दरअसल, मजिस्ट्रेट कोर्ट ने पहले सोनिया गांधी के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग वाली याचिका ठुकरा दी थी। इस फैसले को चुनौती देते हुए शिकायतकर्ता ने विशेष अदालत का दरवाजा खटखटाया।
विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने की पीठ ने माना कि पिछले आदेश में पर्याप्त कारण दर्ज नहीं किए गए और पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट लेना भी जरूरी नहीं समझा गया। इसके बाद अदालत ने पूरे मामले को फिर से मजिस्ट्रेट कोर्ट भेज दिया है। अब इस पर 29 सितंबर को नई सुनवाई होगी, जिसके बाद आगे की कार्रवाई का रास्ता तय हो सकेगा।
भाजपा प्रवक्ता ने उठाए सवाल
अदालत के आदेश के बाद भाजपा ने इस मुद्दे को हवा देने में कोई समय नहीं गंवाया। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने प्रेस के सामने कांग्रेस पर जोरदार हमला बोला। उन्होंने दावा किया कि सोनिया गांधी का नाम 1980 की मतदाता सूची में तब दर्ज कर लिया गया था, जबकि उन्हें भारतीय नागरिकता उस वक्त हासिल नहीं हुई थी।
प्रदीप भंडारी ने कहा कि यह सिर्फ एक कागजी गलती नहीं हो सकती। उन्होंने राहुल गांधी से पूछा कि उनकी मां का नाम वोटर लिस्ट में किसने और किस प्रक्रिया से जोड़ा? क्या इसके पीछे उस दौर की सरकार या किसी असरदार शख्स की मदद का हाथ था? उन्होंने मांग की कि यह जांचा जाए कि नाम दर्ज कराते समय नियमों का पालन हुआ भी या नहीं।

1980 की वोटर लिस्ट विवाद की पूरी कहानी
इस विवाद की जड़ में अधिवक्ता विकास त्रिपाठी की एक शिकायत है। उनका आरोप है कि नई दिल्ली लोकसभा सीट की 1980 की मतदाता सूची में सोनिया गांधी का नाम शामिल था, जबकि उन्हें भारतीय नागरिकता 30 अप्रैल 1983 को मिली थी। यानी नागरिकता मिलने से तीन साल पहले तक उनका नाम मतदाता सूची में दर्ज रहना गंभीर अनियमितता है।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि सोनिया गांधी का नाम 1980 की सूची में आने के बाद 1982 में हटाया गया और फिर 1983 में पुनः जोड़ा गया। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने अदालत से जांच के आदेश और FIR दर्ज करने की मांग की थी।
यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि ये सभी अभी **शिकायत में लगाए गए आरोप** हैं। अदालत ने इन्हें साबित तथ्य के तौर पर माना नहीं है। सोनिया गांधी या कांग्रेस की ओर से इस विषय पर अदालत के समक्ष जो तथ्य सामने आएंगे, उसी पर मामले की दिशा तय होगी।

कांग्रेस के लिए बढ़ सकती है मुश्किलें
राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि अदालत के इस आदेश के बाद कांग्रेस की चुनौती बढ़ गई है। विपक्षी पार्टियां इस मुद्दे को सत्ता और प्रभाव के दुरुपयोग से जोड़कर पेश कर रही हैं। वहीं कांग्रेस इसे राजनीतिक प्रतिशोध कहकर खारिज कर सकती है, लेकिन अदालत में मामला फिर से जीवित हो चुका है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
29 सितंबर को होने वाली सुनवाई के बाद तय होगा कि इस मामले में FIR दर्ज होती है या याचिका एक बार फिर खारिज होती है। इस बीच भाजपा इस मुद्दे को जमकर उठाने की तैयारी में है और कांग्रेस के लिए सफाई पेश करना आसान नहीं होगा।
























