देश में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और उसकी निष्पक्षता को लेकर जारी बहस के बीच शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता आनंद दुबे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और आयोग से सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। कांग्रेस के विरोध के बीच उद्धव गुट ने भी आयोग को लेकर उठे सवालों पर चिंता जताई। दुबे का कहना है कि यदि आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच मतभेद की खबरें सही हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर विषय है। वहीं, अगर खबरें गलत हैं, तो चुनाव आयोग को सामने आकर उनका खंडन करना चाहिए।
आनंद दुबे ने कहा कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था से निष्पक्षता और पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में उसके कामकाज को लेकर कोई गंभीर खबर सामने आए तो संस्था की जिम्मेदारी है कि वह जनता के संदेह दूर करे। उन्होंने मीडिया में आई एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि आयोग के तीनों प्रमुख अधिकारियों—मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—के बीच बीते दस महीनों में कई बार मतभेद और नोकझोंक होने की बात कही गई है।

चुनाव आयोग से आरोपों पर जवाब देने की मांग
दुबे के मुताबिक, लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ माना जाता है और प्रकाशित खबरों को बिना जवाब के नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि रिपोर्ट में किए गए दावे सही हैं या नहीं। उनके अनुसार, यदि खबर में सच्चाई नहीं है तो चुनाव आयोग को उसका खंडन करना चाहिए। लेकिन अगर आयोग चुप रहता है, तो लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।
उन्होंने सवाल किया कि आयोग की चुप्पी को किस रूप में देखा जाए—क्या इसे आरोपों की मौन स्वीकृति समझा जाए, या फिर यह माना जाए कि चुनावी प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी हुई है? दुबे ने एसआईआर में कथित धांधली और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती को लेकर भी चिंता जताई। हालांकि, उन्होंने इन बातों को आरोपों और सवालों के रूप में रखा और आयोग से सीधे स्पष्टीकरण मांगा।
दुबे ने कहा कि यदि खबर सही है, तो संबंधित पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और इस्तीफे की मांग उठ सकती है। इसके उलट, यदि खबर गलत है तो आयोग को स्पष्ट शब्दों में यह बताना चाहिए कि संस्था के भीतर किसी तरह का विवाद नहीं है। उनका तर्क था कि सार्वजनिक भरोसा बनाए रखने के लिए चुप्पी के बजाय पारदर्शी जवाब जरूरी है।

विपक्ष की भूमिका पर क्या बोले आनंद दुबे?
शिवसेना (यूबीटी) नेता ने कहा कि विपक्ष का काम सरकार और संस्थाओं से सवाल पूछना है, खासकर तब जब किसी मुद्दे पर स्थिति साफ न हो। उन्होंने विपक्ष की भूमिका की तुलना आईने पर जमी धूल साफ करने से की—ताकि तस्वीर स्पष्ट दिखाई दे। दुबे के अनुसार, सवाल उठाना किसी संस्था को कमजोर करना नहीं, बल्कि तथ्यों को सामने लाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने का तरीका है।
उन्होंने यह भी पूछा कि जब चुनावी फैसलों से जुड़े मामलों—जैसे राजनीतिक दलों के विभाजन, चुनाव चिह्न पर निर्णय या नए नाम को मंजूरी देने—की बात आती है, तब भाजपा सामने क्यों आती है, जबकि मौजूदा सवाल सीधे चुनाव आयोग से किए जा रहे हैं। दुबे ने कहा कि विपक्ष ने सरकार से नहीं, आयोग से जवाब मांगा है। इसलिए आयोग को ही अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
मुंबई में प्रस्तावित प्रदर्शन पर यूबीटी का रुख
सीजेपी ने 2 अक्टूबर को मुंबई में चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए आनंद दुबे ने कहा कि लोकतंत्र में प्रदर्शन और धरना देना नागरिकों तथा संगठनों का अधिकार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सीजेपी अपने तरीके से काम करता है और शिवसेना (यूबीटी) अपनी राजनीतिक गतिविधियां अलग तरीके से चलाती है।
दुबे ने प्रदर्शन के समर्थन या विरोध में कोई स्पष्ट घोषणा करने के बजाय मुद्दे के तथ्यात्मक पहलू पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यदि अधिकारियों के बीच मतभेद की खबर सही है, तो यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा। और यदि रिपोर्ट गलत है, तो चुनाव आयोग को सार्वजनिक तौर पर इसका खंडन करना चाहिए।
आयोग के जवाब पर टिकी निगाहें
चुनाव आयोग विवाद के बीच आनंद दुबे के बयान ने संस्था की पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही पर बहस को फिर तेज कर दिया है। फिलहाल उनकी मुख्य मांग यही है कि आयोग रिपोर्ट में लगाए गए दावों पर अपना पक्ष रखे। खबरों की पुष्टि या खंडन होने तक इन दावों को रिपोर्ट में सामने आई जानकारी और राजनीतिक नेता के सवालों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। आयोग की प्रतिक्रिया से ही यह साफ होगा कि विवाद पर आधिकारिक स्थिति क्या है और जनता के सामने उठे संदेहों का समाधान किस तरह किया जाता है।























