सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच प्रणाली पर की गई सख्त मौखिक टिप्पणी ने पुलिस की जवाबदेही और निष्पक्षता पर बहस छेड़ दी। अदालत ने सवाल उठाया कि यदि जांच के हर कदम में किसी एजेंडे की झलक दिखे, तो लोगों का पुलिस पर भरोसा कैसे बना रहेगा। इसी दौरान उसने यह भी पूछा कि क्यों न सभी मामलों की जांच सीबीआई को सौंपकर राज्य पुलिस को भंग कर दिया जाए।
इस टिप्पणी के बाद स्वाभाविक रूप से सवाल उठा: क्या किसी राज्य की पूरी पुलिस व्यवस्था को सचमुच खत्म किया जा सकता है? इसका जवाब समझने के लिए अदालत की मौखिक टिप्पणी, संविधान में पुलिस की स्थिति और राज्य तथा केंद्र सरकार की शक्तियों के बीच अंतर जानना जरूरी है।
मौखिक टिप्पणियां, अंतिम फैसला
सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों की मौखिक टिप्पणियां अपने आप में अंतिम फैसला या बाध्यकारी आदेश नहीं होतीं। वे मामले पर अदालत की चिंता, सवाल या प्रारंभिक राय व्यक्त कर सकती हैं। किसी विभाग को भंग करना या उसकी शक्तियों में बड़ा बदलाव करना अलग कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया है।
इसलिए पुलिस व्यवस्था को लेकर की गई सख्त टिप्पणी को यह नहीं माना जा सकता कि राज्य पुलिस को तत्काल समाप्त करने का आदेश दे दिया गया है। ऐसी टिप्पणियों का मकसद अक्सर जांच की निष्पक्षता पर जोर देना, संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगना और व्यवस्था में सुधार की जरूरत को सामने लाना होता है।
पुलिस किसके अधिकार क्षेत्र में?
भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में ‘पुलिस’ और ‘लोक व्यवस्था’ राज्य सूची के विषय हैं। इसका सामान्य अर्थ है कि अपने राज्य में पुलिस का गठन, प्रशासन और रोजमर्रा का नियंत्रण मुख्य रूप से राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। पुलिस बल कानून-व्यवस्था बनाए रखने, अपराध रोकने और आपराधिक मामलों की जांच करने में अहम भूमिका निभाता है।
राज्य सरकार यह तय कर सकती है कि पुलिस विभाग का प्रशासन किस तरह चलेगा। वह कानून के दायरे में पुलिस बल का पुनर्गठन कर सकती है, अलग-अलग इकाइयां बना सकती है या उनमें बदलाव कर सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई सरकार मनमाने ढंग से कानून और संवैधानिक व्यवस्था से बाहर जाकर पुलिस की पूरी भूमिका समाप्त कर सकती है।
पुलिस व्यवस्था भंग करने की शक्ति?
सामान्य परिस्थितियों में पुलिस से जुड़े बड़े प्रशासनिक और नीतिगत फैसलों में राज्य सरकार और राज्य विधानसभा की प्रमुख भूमिका होती है। राज्य का गृह विभाग पुलिस प्रशासन की निगरानी करता है, जबकि पुलिस का गठन और कार्य कानूनों तथा नियमों के तहत होता है।
राज्य सरकार पुलिस के ढांचे में बदलाव, विभागीय पुनर्गठन या किसी विशेष इकाई के कामकाज में संशोधन कर सकती है। विधानसभा कानून बना सकती है या मौजूदा कानून में बदलाव कर सकती है। हालांकि, पूरे राज्य से पुलिस बल को अचानक हटा देना न तो साधारण प्रशासनिक फैसला है और न ही व्यावहारिक विकल्प। कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी किसी न किसी सक्षम व्यवस्था को निभानी ही होगी।
इसलिए “पुलिस को भंग करना” और पुलिस विभाग का पुनर्गठन करना दो अलग बातें हैं। किसी विंग को बंद या पुनर्गठित किया जा सकता है, लेकिन राज्य में सुरक्षा और कानून लागू करने की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती।
क्या केंद्र राज्य पुलिस खत्म कर सकता?
सामान्य स्थिति में केंद्र सरकार राज्य पुलिस का रोजमर्रा का संचालन अपने हाथ में नहीं लेती। राज्य पुलिस राज्य सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करती है। केंद्र की अपनी जांच और सुरक्षा एजेंसियां हैं, लेकिन उनका अस्तित्व राज्य पुलिस को अपने आप समाप्त नहीं करता।
कुछ मामलों में केंद्रीय एजेंसी से जांच कराने का आदेश दिया जा सकता है। सीबीआई को जांच सौंपने के लिए आम तौर पर संबंधित राज्य की सहमति या सक्षम अदालत का आदेश अहम होता है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट उचित मामलों में किसी विशेष जांच को सीबीआई को सौंप सकते हैं, लेकिन इससे राज्य पुलिस का पूरा विभाग भंग नहीं होता। जांच किसी केंद्रीय एजेंसी को जाना और राज्य की पुलिस व्यवस्था समाप्त होना अलग-अलग बातें हैं।
राष्ट्रपति शासन में क्या बदलता है?
यदि किसी राज्य में संवैधानिक शासन चलाना संभव न रहने की स्थिति बनती है, तो संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार की शक्तियां प्रभावित होती हैं और राज्य का प्रशासन राज्यपाल के माध्यम से संचालित होता है। केंद्र की भूमिका बढ़ जाती है।
फिर भी राष्ट्रपति शासन लगने का अर्थ यह नहीं है कि पुलिस बल खत्म कर दिया जाता है। पुलिस राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने का काम जारी रखती है; बदलाव मुख्यतः प्रशासनिक नियंत्रण और शासन संचालन में होता है। राष्ट्रपति शासन भी संवैधानिक प्रक्रिया के अधीन है और इसे पुलिस व्यवस्था भंग करने का सामान्य रास्ता नहीं माना जा सकता।
पुलिस सुधार में अदालतों की भूमिका?
अदालतें पुलिस बल का रोजमर्रा का प्रशासन नहीं चलातीं, लेकिन पुलिस की कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा कर सकती हैं। यदि किसी मामले में जांच पक्षपातपूर्ण, अनुचित या लापरवाही से की गई हो, तो अदालत जांच की निगरानी कर सकती है, उसे किसी दूसरी एजेंसी को सौंपने का निर्देश दे सकती है या जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई पर विचार कर सकती है।

























