Judge Impeachment Process in India: भारत में न्यायपालिका का महत्व अत्यंत बड़ा है और जज बनना अनेक वर्षों की मेहनत और समर्पण का परिणाम होता है। लेकिन जज को उसके पद से हटाने की प्रक्रिया भी इतनी ही कठिन और जटिल है, जितनी कि जज बनना। संविधान ने जजों को मजबूत सुरक्षा दी है ताकि वे स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से न्याय कर सकें, लेकिन यदि कोई जज गलत निर्णय या कार्य करता है, तो उसे पद से हटाने की प्रक्रिया भी लोकतांत्रिक और नियमबद्ध है। इस प्रक्रिया को ‘इंपीचमेंट’ कहा जाता है, जो कि संविधान के तहत एक कठोर और लंबी प्रक्रिया है। आइए, विस्तार से जानते हैं कि भारत में जज को उसके पद से हटाने का क्या तरीका है और इसमें कौन-कौन से नियम शामिल हैं।
संविधान में जज को हटाने का नियम
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(4), अनुच्छेद 217 और 218 में जजों को पद से हटाने का प्रोसेस स्पष्ट रूप से उल्लेखित है। इन प्रावधानों के अनुसार, यदि किसी जज पर “साबित हुआ दुर्व्यवहार” या “अक्षम्य अक्षमता” का आरोप सिद्ध हो जाता है, तो ही उसे हटाया जा सकता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोप का प्रमाणित होना आवश्यक है।
जज को हटाने का प्रक्रिया
- मोटिवेशन (मोटिवेशन लाना): जज को पद से हटाने के लिए सबसे पहले लोकसभा या राज्यसभा में एक प्रस्ताव लाना पड़ता है। यह प्रस्ताव कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर से या लोकसभा और राज्यसभा दोनों में से किसी एक सदन में लाया जा सकता है। यह प्रस्ताव ‘मोशन’ के रूप में जाना जाता है।
- स्पीकर का कार्यवाही: इस मोशन को यदि स्पीकर स्वीकार कर लेते हैं, तो मामला आगे बढ़ता है। स्पीकर के स्वीकृति के बाद, जज के खिलाफ जांच के लिए एक समिति का गठन किया जाता है।
- जांच समिति का गठन: जज के खिलाफ जांच के लिए तीन सदस्यों की समिति बनती है, जिसमें एक सुप्रीम कोर्ट का जज, एक हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस और एक जाने-माने कानूनी विशेषज्ञ शामिल होते हैं। यह समिति जज के खिलाफ आरोपों की जांच करती है और रिपोर्ट तैयार करती है।
- रिपोर्ट का पारित होना: यदि जांच रिपोर्ट में आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश की जाती है। इसके बाद दोनों सदनों को दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास करना पड़ता है।
- राष्ट्रपति का आदेश: जब दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो राष्ट्रपति जज को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं। यह पूरी प्रक्रिया बहुत ही कठोर और सावधानीपूर्वक होती है ताकि किसी भी जज का अनावश्यक उत्पीड़न न हो सके।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा का केस
हाल ही में एक उल्लेखनीय मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा का रहा है। 14 मार्च 2025 को दिल्ली में उनके सरकारी घर में आग लगी, जिसमें भारी मात्रा में जला हुआ नकदी पाया गया। यह घटना उस समय हुई जब जस्टिस वर्मा अपने परिवार के साथ भोपाल में थे। इस मामले ने पूरे देश का ध्यान खींचा, क्योंकि इससे जुड़ी अनेक बातें संदेह के घेरे में आ गईं।
इस घटना के तुरंत बाद, सुप्रीम कोर्ट ने तेजी से संज्ञान लिया और तीन जजों की एक जांच समिति का गठन किया। जांच के दौरान पता चला कि जज के घर से मिले नकदी का स्रोत और आग लगने के कारण स्पष्ट नहीं थे। जांच में यह भी संकेत मिले कि सबूतों से छेड़छाड़ की गई हो सकती है। इस संदर्भ में, 31 जुलाई 2025 को लोकसभा के 146 सांसदों ने मिलकर राष्ट्रपति को यशवंत वर्मा को पद से हटाने का प्रस्ताव भेजा।
जांच रिपोर्ट और आगे की कार्यवाही
जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह माना कि जज के घर से मिले नकदी का स्रोत स्पष्ट नहीं है और आग लगने के बाद सबूतों से छेड़छाड़ के संकेत मिले हैं। इसके आधार पर, 10 अप्रैल 2026 को जस्टिस वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि जज किसी तरह के अनुचित कार्य में संलिप्त पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है, भले ही वे उच्च पद पर हों।

























