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जाने पुराने जमाने के राजा-महाराजाओं के महलों की ठंडक का रहस्य

The Secret of Coolness in Ancient Times: इतिहासकारों और वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, पुराने समय में महलों और किलों का निर्माण सिर्फ शाही ठाट-बाट के लिए नहीं, बल्कि मौसम की पड़ताल करके किया जाता था। हर ईंट, हर दरवाजा और हर खिड़की की दिशा विचार के बाद तय की जाती थी।

पुराने समय में बिना एसी कैसे रहते थे लोग?

HIGHLIGHTS

  • प्राचीन वास्तुकला और मौसम के अनुसार डिजाइन
  • मोटी दीवारों का वैज्ञानिक महत्व
  • पत्थर और चूने से बने घर क्यों रहते थे ठंडे
  • ऊंची छतों का तापमान नियंत्रण में योगदान
  • गुंबद (Domes) कैसे देते थे प्राकृतिक ठंडक

The Secret of Coolness in Ancient Times: आज के दौर में गर्मी का मौसम आते ही ही लोगों की पहली प्राथमिकता पंखा, कूलर और एसी जुटाना बन जाती है। शहरी जीवन में कई लोगों के लिए इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बिना गर्मी में एक पल भी गुजारना लगभग असंभव सा लगता है। बिजली के इन यंत्रों ने हमारी जिंदगी को आसान तो बना दिया है, लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा पुराने जमाने में जब बिजली ही नहीं थी, तब लोग भीषण गर्मी और उमस भरे मौसम से कैसे निपटते रहते होगे।

खासकर राजा-महाराजा, जो विशाल महलों और किलों में रहते थे, आखिर वे अपने महलों को ठंडा कैसे रखते होगे। क्या वे भी तपती धूप और लू की मार झेलते थे? आए बताते है जो कि पुराने पुराने समय के लोगों के पास आधुनिक मशीनें भले ही नहीं थीं, लेकिन उन्हें प्रकृति और वास्तुकला (Architecture) की गहरी समझ जरुर थी। उनकी यही समझ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण उनके महलों को बिना एसी और कूलर के भी ठंडे और आरामदायक बनाए रखने में सक्षम था। आइए, जानते हैं उन प्राचीन तकनीकों के बारे में, जो आज भी हमें हैरान करती हैं।

मौसम के अनुसार वास्तुकला का जादू

बता दें कि इतिहासकारों और वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, पुराने समय में महलों और किलों का निर्माण सिर्फ शाही ठाट-बाट के लिए नहीं, बल्कि मौसम की पड़ताल करके किया जाता था। हर ईंट, हर दरवाजा और हर खिड़की की दिशा विचार के बाद तय की जाती थी।

मोटी दीवारों का अहम रोल

बता दें कि हमने देखा होगा कि पुराने महलों की दीवारें काफी मोटी होती हैं। यह सिर्फ सुरक्षा के लिए नहीं था, बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण छिपा था। मोटी दीवारें अत्यधिक गर्मी सोख लेती थीं, लेकिन उसे अंदर तक पहुंचने नहीं देती थीं। सामग्री (जैसे चूना, मिट्टी, और पत्थर) के चयन से यह सुनिश्चित किया जाता था कि दिन में जब बाहर तापमान 45 डिग्री पार करे, तो भी महल के अंदर का तापमान सुखदायक बना रहे।

ऊंची छतें और गुंबद

आपको बता दें कि पहले के लोग महलों की छतें बेहद ऊंची बनाते थे। गर्म हवा हल्की होती है और ऊपर उठने की प्रवृत्ति रखती है। ऊंची छतों के कारण गर्म हवा कमरे के ऊपरी हिस्से में फंस जाती थी, जबकि नीचे बैठे लोगों को ठंडी हवा का आनंद मिलता था। कई महलों में गुंबद (Domes) का उपयोग किया जाता था, जो गर्मी को बेअसर कर अंदर ठंडक प्रदान करते थे।

खिड़कियां और वेंटिलेशन का खास इंतजाम

पुराने महलों में खिड़कियों और वेंटिलेटर का डिजाइन आज की तुलना में कहीं अधिक सोच-समझकर बनाया जाता था।

  • ‘जाली’ का कमाल: बता दें कि पहले के राजपूत और मुगल वास्तुकला में आपने सुंदर ‘जालीदार’ खिड़कियां देखी होंगी। ये सिर्फ श्रृंगार के लिए नहीं थीं। जब गर्म हवा इन छोटे छेदों (जालियों) से गुजरती थी, तो दबाव के कारण उसकी गति बढ़ जाती थी और वह तेजी से ठंडी हो जाती थी। इसे वेंचुरी इफेक्ट (Venturi Effect) भी कहा जाता है। यह ठंडी हवा अंदर पहुंचकर महल को एसी जैसा आराम दिया करता था।
  • धूप से बचाव: पूराने जामने में देखे तो खिड़कियों की दिशा ऐसी रखी जाती थी कि सीधी धूप या गर्म हवा कभी भी कमरे के अंदर तक ना पहुंच पाए। साथ ही, वेंटिलेटर ऐसे स्थानों पर बनाए जाते थे जहां से गर्म हवा बाहर निकल जाए और ताजी हवा का संचार बना रहे।
  • प्रकृति का तड़का: पेड़-पौधे और जल स्रोत

प्राचीन कारीगरों को पता था कि ईंट-पत्थर के साथ-साथ प्रकृति को भी ठंडक के लिए शामिल करना होगा।

  • हरियाली का फायदा: पहले देखा जाता था कि महलों के आसपास बड़े-बड़े पेड़ और बगीचे लगाए जाते थे। इन पेड़ों की घनी छांव से ना सिर्फ धूप रुकती थी, बल्कि ‘ट्रांसपिरेशन’ (पौधों द्वारा पानी का वाष्पीकरण) की प्रक्रिया से आसपास का वातावरण भी ठंडा रहता था। गर्म हवाएं सीधे महल की दीवारों तक पहुंचकर उन्हें गर्म नहीं कर पाती थीं।
  • तालाब और फव्वारे: पहले जमाने में जल का तत्व ठंडक का सबसे बड़ा स्रोत है। कई महलों के बीचों-बीच या आसपास बड़े तालाब, फव्वारे और बावड़ी बनाई जाती थीं। जब हवा पानी के ऊपर से गुजरती थी, तो वह वाष्पीकरण की वजह से ठंडी हो जाती थी और महल के अंदर पहुंचकर राहत प्रदान करती थी। यह प्रक्रिया आज के ‘एयर कूलर’ जैसी ही काम करती थी, लेकिन पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से।

जाने आज के घरों में क्यों एसी की जरूरत?

आज कल सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब पूराने जमाने के लोग बिना बिजली के ठंडे रह सकते थे, तो आज हम इतने परेशान क्यों हैं? इसका एक बड़ा कारण बदलती वास्तुकला है। आजकल मॉडर्न घरों में जगह की कमी के चलते छोटी खिड़कियां, पतली दीवारें (RCC) और कम वेंटिलेशन देखने को मिलता है।

आज के घर ‘ग्लास और कंक्रीट’ से बने होते हैं, जो गर्मी को अंदर ही फंसाए रखते हैं (ग्रीनहाउस इफेक्ट)। कई ऐसे फ्लैट्स हैं जहां प्राकृतिक हवा और रोशनी आने का कोई रास्ता ही नहीं होता। ऐसे में लोगों को पूरी तरह से एसी और कूलर पर निर्भर होना पड़ता है, जो ना सिर्फ बिजली खर्च बढ़ाता है, बल्कि पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाता है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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