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दिल्ली जिमखाना विवाद: जाने सत्ता और विशेषाधिकार की कहानी

Delhi News: ब्रिटिश शासन के दौरान देश भर में कई जिमखाने स्थापित किए गए। 1861 में रुडकी में पहला जिमखाना बना, फिर बंबई (1875), पूना (1882), मद्रास (1884), अहमदाबाद और कराची (1885-86) में भी ये क्लब खुले। इनका मुख्य उद्देश्य था अपने अफसरों को एक ऐसा वातावरण प्रदान करना जहां वे भारतीय गर्मी से बचकर सूट-बूट पहने, व्हिस्की पीकर और क्रिकेट या पोलो खेलकर इंग्लैंड जैसा राजकीय जीवन जी सकें।

दिल्ली जिमखाना विवाद: अरबों की जमीन, कौड़ियों का किराया और अफसरों का ‘राज’

HIGHLIGHTS

  • VIP क्लब पर सरकार का बड़ा एक्शन
  • अंग्रेज गए, लेकिन नहीं गई ‘जिमखाना संस्कृति’
  • जनता की जमीन पर अफसरों की शाही जिंदगी!
  • 1000 रुपये किराया और अरबों की जमीन
  • क्या अफसरों के लिए बने हैं ये ‘राजमहल’?

Delhi News: दिल्ली जिमखाना (Delhi Gymkhana) इन दिनों सुर्खियों में है, लेकिन वजह उसके इतिहास या खेल संस्कृति को लेकर नहीं, बल्कि सरकार द्वारा जारी एक नोटिफिकेशन को लेकर है। सरकार ने इस क्लब को प्रधानमंत्री के आवास के बगल में स्थित अपनी वर्तमान ‘प्राइम लोकेशन’ खाली करने का आदेश दिया है। इस फैसले के बाद से देश के शीर्ष अफसरों और इस क्लब के सदस्यों के बीच हड़कंप मचा हुआ है। यह विवाद सिर्फ एक जगह को बदलने का मामला नहीं है, बल्कि यह उस विशेषाधिकारवादी संस्कृति को उजागर करता है जो आजादी के 70 साल बाद भी अपने बसेरे मजबूती से टिकी हुई है। आइए, समझते हैं कि आखिर ‘जिमखाना’ है क्या और यह विवाद क्यों महत्वपूर्ण है।

जिमखाना: नाम की है अनोखी कहानी

‘जिमखाना’ शब्द सुनने में अजीब लगता है, लेकिन इसका इतिहास बेहद दिलचस्प है। यह दरअसल अंग्रेजों की देन है। मुगलकाल में फारसी भाषा प्रचलित थी, जहां किसी भी जगह या ठिकाने को ‘खाना’ कहा जाता था, जैसे दवाखाना या बावरचीखाना। जब अंग्रेज भारत आए, तो उन्हें अपने अफसरों के मनोरंजन और व्यायाम (जिमनास्टिक्स) के लिए जगह की जरूरत थी। उन्होंने अंग्रेजी के ‘जिम’ (Gym) और फारसी के ‘खाना’ (Khana) को मिलाकर ‘जिमखाना’ शब्द गढ़ दिया।

ब्रिटिश शासन के दौरान देश भर में कई जिमखाने स्थापित किए गए। 1861 में रुडकी में पहला जिमखाना बना, फिर बंबई (1875), पूना (1882), मद्रास (1884), अहमदाबाद और कराची (1885-86) में भी ये क्लब खुले। इनका मुख्य उद्देश्य था अपने अफसरों को एक ऐसा वातावरण प्रदान करना जहां वे भारतीय गर्मी से बचकर सूट-बूट पहने, व्हिस्की पीकर और क्रिकेट या पोलो खेलकर इंग्लैंड जैसा राजकीय जीवन जी सकें।

अस्मिता का प्रतीक थे ये क्लब

ये जिमखाने सिर्फ मनोरंजन के केंद्र नहीं थे, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य की ताकत और अहंकार का प्रतीक थे। भारतीयों की इनमें एंट्री वर्जित थी। चटगांव के यूरोपियन क्लब के बाहर तो एक बोर्ड लगा था- ‘डॉग्स एंड इंडियंस नॉट अलाउड’ (कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित)। इसी अपमान के खिलाफ क्रांतिकारी प्रीतिलता वड्डेदार ने चटगांव यूरोपियन क्लब में आग लगा दी थी। यह घटना उस समय भारतीयों के गुस्से का प्रतीक थी, जो अपनी ही जमीन पर किसी तरह दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर रह गए थे।

आजादी के बाद बदले मालिक, नहीं बदली मानसिकता

1947 में जब देश आजाद हुआ, अंग्रेज चले गए, लेकिन उनके छोड़े गए ये ठिकाने खाली नहीं हुए। इन पर अब देश के नए अफसर—आईएएस, आईपीएस, जज और सीनियर वकीलों—का कब्जा हो गया। ‘इंपीरियल दिल्ली जिमखाना’ का नाम बदलकर सिर्फ ‘दिल्ली जिमखाना’ कर दिया गया, लेकिन उसका शाही अंदाज वही रहा।

सबसे बड़ा सवाल इस जमीन को लेकर है। अंग्रेजों ने 1928 में दिल्ली की 27 एकड़ सबसे महंगी जमीन अपने अफसरों के लिए लीज पर ली थी। आजादी के बाद यह जमीन सरकार की हो गई, लेकिन यहां संचालित क्लब सरकार को महज 1000 रुपये सालाना किराया देता है। आज के दौर में, जहां इस जमीन की कीमत अरबों रुपये है, क्या यह उचित है कि देश के शीर्ष अफसर पब्लिक की जमीन पर कौड़ियों के किराए पर शाही जीवन जिएं? यदि ये क्लब अफसरों के लिए हैं, तो उन्हें बाजार दर पर किराया देना चाहिए, न कि सब्सिडी वसूलनी चाहिए।

वंशवाद और बंद दरवाजे

दिल्ली जिमखाना और ऐसे अन्य क्लबों में सदस्यता एक बड़ी दौड़ है। आम जनता का नंबर 30-40 साल बाद भी नहीं आता, जबकि पुराने सदस्यों के बच्चों को सदस्यता आसानी से मिल जाती है। यह एक प्रकार का वंशवाद है, जहां क्लब की कमेटी अपने लोगों को ही प्राथमिकता देती है। यह क्लब पब्लिक की जमीन पर बसा है, लेकिन पब्लिक के लिए बंद है। यहां तक कि मेंबरशिप फीस और सेवाओं के दरें भी इतनी सस्ती हैं कि बाहर का आम आदमी केवल सपना देख सकता है।

आज भी कायम है गुलामी की मानसिकता

यह केवल दिल्ली जिमखाना की कहानी नहीं है। देश भर के ऐसे क्लब आज भी भारतीय संस्कृति का अपमान करते हैं। भूटान के धर्मगुरु को पोशाक के चलते रोका गया, एमएफ हुसैन को नंगे पैर चलने पर मुंबई के विलिंगडन क्लब से वापस भेजा गया। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु को धोती पहनने पर कोलकाता क्लब में रोक लगाई गई। मद्रास क्लब में जजों को भी पारंपरिक पोशाक पहनने पर आपत्ति का सामना करना पड़ा। मुंबई के ब्रीच कैंडी क्लब में तो आजादी के दशकों बाद भी ट्रस्टी बनने के लिए ‘गोरा होना’ जरूरी था।

सवाल उठने लाजिमी हैं

दिल्ली जिमखाना को अपनी जगह खाली करने को कहा गया है और इस पर ‘हाय-तौबा’ मची हुई है। जिमखाने के अंदर टेनिस कोर्ट, स्विमिंग पूल, बार और लाइब्रेरी हैं, जहां शराब और खाने के दर बाहर की दुनिया से काफी कम हैं। लेकिन इस आलीशान दुनिया के बाहर आम आदमी 100 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल भर रहा है और महंगाई से जूझ रहा है।

यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ये अफसर राजा हैं? जनता की जमीन पर क्यों चलाया जाए वही राजशाही जो अंग्रेजों ने अपने लिए बनाई थी? अगर यह पब्लिक की प्रॉपर्टी है, तो उस पर प्राइवेट क्लबों जैसे नियम क्यों लागू होते हैं? दिल्ली जिमखाना का यह विवाद सिर्फ एक क्लब का मसला नहीं, बल्कि उस विसंगति को उजागर करता है जिसमें हमारे शासक वर्ग और जनता के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। सौ बात की एक बात—जब तक इन औपनिवेशिक किलों के दरवाजे आम जनता के लिए नहीं खुलेंगे, तब तक ये सवाल और तीखे होते जाएंगे।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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