हर चुनाव के बाद EVM यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को लेकर तरह-तरह के सवाल खड़े हो जाते हैं। हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उस बयान के बाद यह बहस और तेज हो गई, जिसमें उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर वोट चोरी और EVM जलाने के गंभीर आरोप लगाए। ऐसे विवादित बयानों के बीच आम मतदाता के मन में एक ही सवाल घूमता है — चुनाव के बाद EVM का क्या होता है?
क्या सच में चुनाव आयोग मतदान समाप्त होते ही ईवीएम मशीनों को आग के हवाले कर देता है, या इनकी हिफाजत के लिए सख्त कानूनी प्रावधान मौजूद हैं? जवाब है — वोटिंग खत्म होने से लेकर मशीन के रिटायर होने तक का हर कदम एक तयशुदा, पारदर्शी और रिकॉर्ड पर आधारित प्रक्रिया से गुजरता है। आइए इसकी पूरी जर्नी समझते हैं।

मतदान के बाद EVM स्ट्रॉन्ग रूम में क्यों?
किसी भी क्षेत्र में मतदान का आखिरी वोट पड़ते ही सभी EVM मशीनों को कड़े सुरक्षा कवच में स्ट्रॉन्ग रूम तक शिफ्ट किया जाता है। इन कमरों में किसी भी तरह का इलेक्ट्रॉनिक गैजेट, मोबाइल फोन या वायरलेस डिवाइस ले जाना पूरी तरह मना होता है। सुरक्षा की ड्यूटी केंद्रीय और राज्य सशस्त्र बलों के जवान निभाते हैं, जो 24 घंटे वहां तैनात रहते हैं। नियमों के मुताबिक उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों को भी सीलबंदी के दौरान मौजूद रहने का मौका दिया जाता है, ताकि प्रक्रिया पर हर पार्टी की मुहर लग जाए।
नतीजों के बाद EVM की जिम्मेदारी
मतगणना पूरी होने और विजेता की घोषणा के बाद भी ईवीएम की कहानी अधूरी रहती है। इस्तेमाल की गई सभी मशीनों को दोबारा सील कर स्ट्रॉन्ग रूम में सुरक्षित रखा जाता है। दरअसल, नतीजों को चुनौती देने के लिए 45 दिनों की कानूनी समय-सीमा तय है। अगर किसी प्रत्याशी को परिणाम पर आपत्ति हो, तो वह इस अवधि में चुनाव याचिका दायर कर सकता है। इसीलिए डेढ़ महीने तक मशीनों को जस का तस संभालकर रखा जाता है, ताकि जरूरत पड़ने पर री-काउंट या जांच संभव हो सके।
जाने 45 दिन बाद EVM जांच
अगर इन 45 दिनों में कोई कानूनी चुनौती नहीं आती, तो ईवीएम मशीनों को सुरक्षित तरीके से केंद्रीय स्टोरेज रूम में ले जाया जाता है। यहां भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ECIL) के विशेषज्ञ इंजीनियर हर मशीन की गहराई से पड़ताल करते हैं। मल्टी-स्टेज टेस्ट में तय मानकों पर खरी उतरने वाली मशीनों को दोबारा चुनावी इस्तेमाल के लिए मंजूरी दे दी जाती है। इसके बाद आवश्यकता के अनुसार इन्हें अन्य राज्यों और जिलों में भेजा जाता है।
दल के सामने होता मॉक पोल
किसी भी नए चुनाव में EVM भेजने से पहले आयोग पारदर्शिता का पूरा ख्याल रखता है। सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को बुलाकर मशीनों का मॉक पोल कराया जाता है, यानी परीक्षण के लिए फर्जी वोट डाले जाते हैं। दलों के प्रतिनिधियों के संतुष्ट होने के बाद चुनावी अधिकारी और प्रतिनिधि दोनों जांच दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते हैं। इतना ही नहीं, कुल जरूरत से लगभग 20 प्रतिशत अतिरिक्त EVM रिजर्व में रखे जाते हैं, ताकि मतदान के दिन कोई मशीन खराब होने पर तुरंत बदलाव किया जा सके।
EVM नष्ट करने का नियम
किसी भी ईवीएम की औसत उम्र लगभग 15 साल मानी जाती है। यह अवधि पूरी होने या मशीन के पूरी तरह बेकार हो जाने पर उसे रिटायर किया जाता है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सच यह है कि इन्हें खुले में जलाना चुनाव आयोग की प्रक्रिया में कहीं नहीं है। पुरानी मशीनें वापस BEL या ECIL की फैक्ट्रियों में भेजी जाती हैं, जहां ई-वेस्ट नियमों के तहत प्लास्टिक पार्ट्स और सर्किट बोर्ड को अलग-अलग करके कटाई और क्रशिंग की जाती है। इस पूरी नष्टीकरण प्रक्रिया की वीडियोग्राफी और बाकायदा रिकॉर्डिंग भी की जाती है।























