वोटर लिस्ट शुद्धिकरण (एसआईआर) प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों ने एक बार फिर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अखबार की एक प्रमुख रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि इस प्रक्रिया के दौरान दो चुनाव आयुक्तों ने कई बार एसआईआर से जुड़े फैसलों पर आपत्ति जताई थी, जिससे राजनीतिक माहौल गरम हो रहा है।
विपक्षी दलों ने इन खुलासों के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के इस्तीफे की मांग तेज कर दी है। वहीं, चुनाव आयोग ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं और इसमें कोई भी मनमानी या विरोधाभास नहीं है।
एसआईआर प्रक्रिया और चुनाव आयोग का स्पष्ट रुख
वोटर लिस्ट शुद्धिकरण (एसआईआर) का उद्देश्य भारतीय चुनाव प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद बनाना है। यह प्रक्रिया वोटर लिस्ट में गलतियों को दूर करने और मतदाताओं की पहचान को सुनिश्चित करने के लिए की जाती है।
लेकिन, हाल की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने कई बार फैसलों और आदेशों पर आपत्ति जताई है, जिनमें से कुछ फैसले उनके बिना जारी किए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, “चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार उन फैसलों पर आपत्ति दर्ज कराई, जो उनकी जानकारी के बिना जारी किए गए थे।”
चुनाव आयोग ने इन आरोपों का जोरदार खंडन किया है। आयोग ने कहा है कि सभी फैसले पारदर्शी ढंग से और सर्वसम्मति से लिए गए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी निर्णय मनमाना नहीं है और सभी अधिकारी अपने-अपने दायित्व का पालन कर रहे हैं। चुनाव आयोग का यह भी कहना है कि विपक्ष के आरोप निराधार हैं और प्रक्रिया का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।
विपक्षी दलों की कड़ी प्रतिक्रिया
इस रिपोर्ट के प्रकाश में आने के बाद विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा कि यह मामला इतना गंभीर है कि इसे संसद में उठाना चाहिए। उन्होंने संसद से आग्रह किया कि वे उस नोटिस ऑफ मोशन को सामने लाएं, जिसमें 60 से अधिक विपक्षी सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग की है।
उनके अनुसार, “पांच महीने पहले ही 60 सांसदों ने राष्ट्रपति को ज्ञापन देकर चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की सिफारिश की थी। अब जब यह खुलासा हुआ है कि चुनाव आयोग में ही मनमानी हो रही है, तो यह जरूरी हो जाता है कि संसद इस मामले में कदम उठाए।”
कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के सदस्यों के बीच बहुमत का समर्थन नहीं था और अब यह स्पष्ट हो रहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त मनमाने ढंग से कार्य कर रहे थे।
सिब्बल ने कहा, “ऐसा लगता है कि इस देश में कुछ लोगों की अंतरात्मा अभी भी जिंदा है। चुनाव आयोग में हो रही गड़बड़ियों को देखिए, पहले सिर्फ एक सदस्य होता था, अब तीन हैं। यह संकेत है कि बहुमत उनके खिलाफ है।”
संजय राउत का आरोप
शिवसेना (UBT) के सांसद संजय राउत ने भी इस मुद्दे में तीखे आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि भारत में चुनाव प्रक्रिया को मानवीय और संस्थागत स्तर पर कमजोर किया गया है। राउत ने कहा, “ज्ञानेश कुमार को तत्काल सस्पेंड किया जाना चाहिए और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
यह देश का चुनाव एक मज़ाक बन गया है। चुनाव आयोग केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। सबसे बड़ा अपराधी अमित शाह हैं, जो देश के चुनाव प्रक्रिया को नियंत्रित कर रहे हैं। यदि प्रधानमंत्री देश को बचाना चाहते हैं, तो उन्हें अमित शाह को कैबिनेट से हटा देना चाहिए। नहीं तो, मैं राष्ट्रपति से भी अपील करूंगा कि वे ज्ञानेश कुमार को हटाएं। यदि कोई कार्रवाई नहीं होती है, तो सेना को आगे आकर देश को तानाशाही से बचाना चाहिए।”
क्या है एसआईआर प्रक्रिया और क्यों हो रहे हैं सवाल?
एसआईआर प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य है मतदाताओं की सूची को साफ-सुथरा और अपडेटेड बनाना। यह प्रक्रिया मतदाता सूची में अनावश्यक नामों को हटाने और नई प्रविष्टियों को जोड़ने का कार्य करती है। इस प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। लेकिन, हाल की रिपोर्ट और विपक्ष के आरोप यह संकेत देते हैं कि चुनाव आयोग के कुछ अधिकारियों ने इस प्रक्रिया में मनमानी की है, जिससे चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।


























