Andaman High Court’s secret: भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधताओं से भरा भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में गिना जाता है। देश की संरचना में 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश (यूनियन टेरिटरीज) शामिल हैं। संवैधानिक व्यवस्था के तहत जहां हर राज्य को अपनी स्वायत्तता दी गई है और प्रत्येक राज्य की अपनी एक अलग राजधानी और उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) है, वहीं केंद्र शासित प्रदेशों की स्थिति थोड़ी अलग है।
अक्सर लोगों के मन में यह जिज्ञासा रहती है कि आखिर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह जैसे प्रमुख केंद्र शासित प्रदेश का अपना हाई कोर्ट क्यों नहीं है? क्या वहां के लोगों को इंसाफ के लिए मुख्य भूमि का रुख क्यों करना पड़ता है? आइए इस न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था को गहराई से समझते हैं।
अंडमान-निकोबार की न्यायिक व्यवस्था का ठिकाना
जब भी अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में कोई बड़ा कानूनी या संवैधानिक मामला सामने आता है, तो तकनीकी रूप से उसका गंतव्य पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता (पूर्व नाम कलकत्ता) होता है। यह व्यवस्था कोई नई नहीं है, बल्कि ब्रिटिश शासन के दौर से चली आ रही है। उस समय इस द्वीप समूह को बंगाल प्रेसीडेंसी के अंतर्गत रखा गया था और न्यायिक मामलों की अंतिम सुनवाई कलकत्ता से होती थी। स्वतंत्रता के बाद भी भारत सरकार ने इसी ढांचे को बरकरार रखा।
हालांकि, समुद्री दूरी और यात्रा की कठिनाइयों को देखते हुए अब स्थिति में कुछ सुधार हुआ है। अब द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में कोलकाता हाई कोर्ट की एक ‘सर्किट बेंच’ (Circuit Bench) स्थापित कर दी गई है। इसका मतलब है कि कोलकाता हाई कोर्ट के जज समय-समय पर पोर्ट ब्लेयर आते हैं और वहीं के मामलों की सुनवाई करते हैं, लेकिन मुख्यालय और अधिकार क्षेत्र तकनीकी रूप से कोलकाता ही माना जाता है।
संविधान में क्या कहा गया है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 214 से 231 तक देश में उच्च न्यायालयों की स्थापना और उनकी शक्तियों का जिक्र है। वहीं, अनुच्छेद 239 से 242 केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन से जुड़े हैं। संविधान निर्माताओं ने यह व्यवस्था इसलिए बनाई, क्योंकि केंद्र शासित प्रदेशों का प्रशासन सीधे केंद्र सरकार के हाथ में होता है। इन क्षेत्रों की आबादी, भौगोलिक फैलाव और आर्थिक संसाधनों को देखते हुए हर जगह एक पूर्णकालिक और स्वतंत्र हाई कोर्ट बनाना संसाधनों का अपव्यय होता।
अन्य केंद्र शासित प्रदेशों का क्या हाल है?
अंडमान-निकोबार अकेला ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसे दूसरे राज्य के हाई कोर्ट के अधीन रखा गया हो। अन्य केंद्र शासित प्रदेशों की न्यायिक व्यवस्था इस प्रकार है:
- लक्षद्वीप: यहां के लोगों को न्याय के लिए केरल हाई कोर्ट (कोच्चि) का दरवाजा खटखटाना होता है।
- चंडीगढ़: यह दो राज्यों (पंजाब और हरियाणा) की संयुक्त राजधानी है, इसलिए यहां पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट की बेंच स्थापित है।
- पुदुचेरी: इसका न्यायिक अधिकार क्षेत्र मद्रास हाई कोर्ट (चेन्नई) के अंतर्गत आता है।
- दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव: इन दोनों केंद्र शासित प्रदेशों के मामलों की सुनवाई बॉम्बे हाई कोर्ट (मुंबई) में होती है।
- (ध्यान देने योग्य बात यह है कि दिल्ली और जम्मू-कश्मीर जैसे कुछ केंद्र शासित प्रदेशों को अपना अलग हाई कोर्ट मिला हुआ है, क्योंकि वहां की विशेष स्थिति और बड़ी आबादी है।)
इस व्यवस्था से जुड़ी बड़ी चुनौतियां
हालांकि प्रशासनिक दृष्टि से यह व्यवस्था सही लगती है, लेकिन जमीनी स्तर पर इससे द्वीपवासियों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है:
- यात्रा और आर्थिक बोझ: अगर किसी व्यक्ति को कोलकाता जाकर अपना केस लड़ना पड़े, तो समुद्री यात्रा या हवाई जहाज का किराया एक आम आदमी की पहुंच से बाहर होता है।
- वकीलों का टोटा: पोर्ट ब्लेयर जैसे दूरस्थ इलाके में अच्छे और अनुभवी सीनियर वकील नहीं रहना चाहते। इसके चलते पीड़ित पक्ष को या तो कम अनुभव वाले वकील के सहारे रहना पड़ता है, या बाहर से वकील बुलाने पड़ते हैं, जिससे खर्चा बहुत बढ़ जाता है।
- भाषा और संस्कृतिक अंतर: द्वीप समूह में बोली जाने वाली स्थानीय भाषाएं, जनजातीय संस्कृति और मुख्य भूमि के बीच एक बड़ी खाई है। कई बार लोग कोर्ट की भाषा और कानूनी जटिलताओं को समझ नहीं पाते।
- न्याय में देरी: “न्याय में देरी, न्याय के अन्याय के बराबर है।” सर्किट बेंच के जजों का आना-जाना लिमिटेड होता है, जिसके कारण केस की सुनवाई में महीनों का समय लग जाता है।






















