संदीप कुमार गर्ग
नोएडा। आज शनिवार को इस्कॉन नोएडा में सांय 5 बजे एक अन्तर्धर्मीय सम्मेलन (Inter-Faith Conference) का आयोजन किया गया, जिसमें अलग अलग धर्मों का पालन करने वाले धार्मिक नेताओं ने भाग लिया। ज्ञात हो इस्कॉन के संस्थापकाचार्य श्रील प्रभुपाद के अमेरिका आगमन के उपलक्ष्य में इस्कॉन पूरे विश्व भर में विश्व हरिनाम सप्ताह का आयोजन कर रहा है, जिसके अन्तर्गत हरिनाम संकीर्तन, पदयात्रा, अखण्ड जप एवं कीर्तन मेले आदि का आयोजन किया जा रहा है।
यह आयोजन इस्कॉन के संस्थापकाचार्य श्रील प्रभुपाद के अमेरिका आगमन की स्मृति में आयोजित विश्व हरिनाम सप्ताह के अंतर्गत किया गया। इस दौरान विश्वभर में हरिनाम संकीर्तन, पदयात्रा, अखंड जप, कीर्तन मेले और विभिन्न आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है।
‘ईश्वर के पवित्र नाम की शक्ति’ पर हुआ विचार-विमर्श
इस्कॉन नोएडा इंटरफेथ कॉन्फ्रेंस का मुख्य उद्देश्य विभिन्न धर्मों के बीच आपसी सद्भाव और एकता का संदेश प्रसारित करना था। सम्मेलन में धार्मिक नेताओं ने अपने-अपने शास्त्रों और धार्मिक परंपराओं के आधार पर ‘ईश्वर के पवित्र नाम की शक्ति’ विषय पर विचार रखे।
वक्ताओं ने कहा कि अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में परमात्मा को पुकारने के लिए अलग-अलग नाम और संबोधन प्रचलित हैं, लेकिन सभी धर्मों का मूल संदेश मानवता, प्रेम, करुणा और शांति की ओर ले जाता है।
विभिन्न धर्मों के नेताओं ने किया पहल का स्वागत
इस्कॉन नोएडा की इस अनूठी पहल का विभिन्न धर्मों का पालन करने वाले धार्मिक नेताओं ने हृदय से स्वागत किया। सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि धार्मिक विविधता के बावजूद सभी मनुष्यों को एक-दूसरे के धर्म और आस्था का सम्मान करना चाहिए।
धार्मिक नेताओं ने कहा कि भगवान, ईश्वर, अल्लाह, खुदा, रब, Lord या God—परम सत्ता को हम किसी भी नाम से पुकारें, पवित्र भगवन्नाम का स्मरण और आश्रय विश्व में शांति एवं सद्भावना स्थापित करने का महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है।
विश्व हरिनाम सप्ताह के माध्यम से शांति और सद्भावना का संदेश
इस्कॉन द्वारा आयोजित विश्व हरिनाम सप्ताह का उद्देश्य हरिनाम संकीर्तन और आध्यात्मिक गतिविधियों के माध्यम से समाज में सकारात्मकता, शांति और सद्भावना का संदेश पहुंचाना है। इसी क्रम में आयोजित इंटरफेथ कॉन्फ्रेंस ने विभिन्न धार्मिक समुदायों को एक मंच पर लाकर आपसी संवाद और आध्यात्मिक एकता का संदेश दिया।
सम्मेलन का समापन इस भावना के साथ हुआ कि धार्मिक मार्ग भले ही अलग-अलग हों, लेकिन मानवता, प्रेम, करुणा और विश्व शांति की कामना सभी को एक सूत्र में जोड़ती है।

























