Information about Wisdom Teeth: अक्ल दाढ़ (Wisdom Teeth) यानी मुंह में निकलने वाले आखिरी दांत, आमतौर पर 17 से 25 साल की उम्र के बीच निकलते हैं। चूंकि इस उम्र में इंसान को अक्ल (समझदारी) आ जाती है, इसलिए इन्हें ‘अक्ल दाढ़’ का नाम दिया गया है। चिकित्सा भाषा में इन्हें ‘थर्ड मोलर्स’ (Third Molars) कहा जाता है। हालांकि, आधुनिक जीवनशैली और खान-पान के कारण आज के युवाओं के जबड़े का आकार पहले की तुलना में थोड़ा छोटा हो गया है। नतीजतन, इन अक्ल दाढ़ों को निकलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती।
जब जबड़े में जगह कम होती है, तो ये दांत तिरछे कोणों में निकलने लगते हैं, मसूड़ों के अंदर ही फंस कर रह जाते हैं या आधे-अधूरे निकलते हैं। इस स्थिति को चिकित्सा भाषा में ‘इम्पैक्टेड विज़्डम टूथ’ (Impacted Wisdom Tooth) कहते हैं। यह स्थिति तेज दर्द, सूजन और बार-बार होने वाले संक्रमण का कारण बनती है। लेकिन, क्या ये दबी हुई अक्ल दाढ़ सिर्फ दर्द और सूजन तक ही सीमित हैं, या इनका संबंध मुंह के कैंसर (Oral Cancer) से भी जुड़ा है? यह सवाल उन लोगों के मन में अक्सर उठता है जिन्हें इम्पैक्टेड अक्ल दाढ़ की समस्या है। आइए, विशेषज्ञों के नजरिए से इस विषय को गहराई से समझते हैं।
अक्ल दाढ़ और मुंह के कैंसर के बीच क्या है असली सच?
मानव रचना डेंटल कॉलेज में ओरल और मैक्सिलोफेशियल सर्जरी विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष डॉ. कुमार रक्षक आनंद की मानें तो, अक्ल दाढ़ सीधे तौर पर मुंह के कैंसर का कारण नहीं बनती हैं। लेकिन, यह बात भी उतनी ही सच है कि ये अप्रत्यक्ष रूप से ऐसी परिस्थितियां बना सकती हैं, जो कैंसर के खतरे को काफी हद तक बढ़ा सकती हैं।
क्लीवलैंड क्लिनिक के मुताबिक, अक्ल दाढ़ मुंह के सबसे अंदरूनी हिस्से में होती हैं। जब ये इम्पैक्टेड हो जाती हैं, तो ये मसूड़ों के ऊतकों या जबड़े की हड्डी के नीचे दब कर रह जाती हैं। समय रहते अगर इन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यहां पानी से भरी थैलियां बन सकती हैं। लंबे समय तक इन सिस्ट का जमे रहना खतरनाक साबित हो सकता है।
दबी हुई अक्ल दाढ़ मुंह के कैंसर का खतरा कैसे बढ़ाती है?
अगर अक्ल दाढ़ सीधे कैंसर नहीं करती, तो फिर खतरा कैसे बढ़ता है? इसे समझने के लिए 4 मुख्य कारणों पर नजर डालना जरूरी है:
- क्रोनिक जलन और घर्षण : जब अक्ल दाढ़ तिरछी दिशा में निकलती है, तो वह लगातार गाल के अंदरूनी हिस्से या जीभ से रगड़ती रहती है। शुरुआत में यह एक साधारण जलन है, लेकिन महीनों या सालों तक लगातार इस तरह के घर्षण से मुंह के अंदर के ऊतकों (Tissues) में माइक्रो-ट्रॉमा (Micro-trauma) होता है। शरीर बार-बार इन कोशिकाओं की मरम्मत करता है, और लगातार मरम्मत की इस प्रक्रिया में सेल्स के म्यूटेट (Mutate) होने का खतरा बढ़ जाता है, जो कैंसर की शुरुआत हो सकता है।
- बैक्टीरियल इन्फेक्शन और टॉक्सिन: इम्पैक्टेड अक्ल दाढ़ के ऊपर मसूड़े का एक छोटा सा ढक्कन बन जाता है। खाने-पीने के बचे हुए कण और बैक्टीरिया इस ढक्कन के नीचे जमा होने लगते हैं। ब्रश करने से भी यहां तक पहुंच पाना नामुमकिन हो जाता है। यहां मौजूद बैक्टीरिया तेजी से बढ़ते हैं और खतरनाक टॉक्सिन और एन्जाइम्स छोड़ते हैं। ये टॉक्सिन आस-पास के स्वस्थ सेल्स को नुकसान पहुंचाते हैं और डीएनए को डैमेज कर सकते हैं।
- डेंटीजरस सिस्टका बनना: जैसा कि पहले बताया गया, दबी हुई अक्ल दाढ़ के आसपास तरल पदार्थ से भरी थैलियां बन जाती हैं, जिन्हें डेंटीजरस सिस्ट कहते हैं। शुरुआत में ये सिस्ट बिल्कुल दर्दरहित होती हैं और नॉन-कैंसरस (Benign) होती हैं। लेकिन, अगर इनकी जांच और उपचार में लापरवाही बरती गई, तो ये सिस्ट बढ़ती जाती हैं और जबड़े की हड्डी को खोखला कर सकती हैं। कुछ दुर्लभ मामलों में, लंबे समय तक रहने वाली इन गांठों में ‘एमेलोब्लास्टोमा’ जैसे ट्यूमर का विकास हो सकता है, जो हानिकारक हो सकता है।
- लोकल इम्यूनिटी का कमजोर होना: जब मुंह का एक हिस्सा महीनों तक संक्रमित और सूजा रहता है, तो वहां की स्थानीय प्रतिरक्षा प्रणाली (Local Immunity) कमजोर हो जाती है। शरीर के डिफेंस मैकेनिज्म लगातार इन्फेक्शन से लड़ते रहने के कारण थक जाते हैं। ऐसे में, अगर कोई सेल पहले से ही असामान्य रूप से बढ़ने लगता है (प्री-कैंसरस स्टेज), तो कमजोर इम्यूनिटी उसे नष्ट करने में नाकामयाब रहती है।
कनाडियन कैंसर सोसाइटी की रिसर्च के अनुसार, मुंह में होने वाली क्रोनिक (पुरानी) जलन और लंबे समय तक चलने वाले इन्फेक्शन को ओरल कैंसर के संभावित रिस्क फैक्टर्स में गिना जाता है। हालांकि, यहां एक बात समझना बहुत जरूरी है—अगर कोई व्यक्ति धूम्रपान करता है, ज्यादा शराब का सेवन करता है, या एचपीवी इन्फेक्शन से पीड़ित है, और उसे इम्पैक्टेड अक्ल दाढ़ की समस्या भी है, तो मुंह के कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
इलाज का तरीका: अक्ल दाढ़ निकलवाना कितना सुरक्षित है?
जब इम्पैक्टेड अक्ल दाढ़ दर्द और सूजन का कारण बनने लगती है, तो डेंटिस्ट या ओरल सर्जन उसे निकालने की सलाह देते हैं। यह एक बहुत ही आम और सुरक्षित ओरल सर्जरी है।
सर्जरी के बाद क्या बदलाव आते हैं?
- दर्द और सूजन: सर्जरी के बाद पहले 2-3 दिन दांत के आस-पास हल्की सूजन और दर्द रहता है, जिसे डॉक्टर द्वारा दी गई दवाइयों से आसानी से कंट्रोल किया जा सकता है। कुछ मामलों में कुछ घंटों तक हल्की ब्लीडिंग भी हो सकती है।
- ड्राई सॉकेट : यह एक दुर्लभ लेकिन दर्दनाक स्थिति है। अगर दांत निकलने के बाद उसकी जगह ब्लड क्लॉट (खून का थक्का) नहीं बन पाता या गिर जाता है, तो हड्डी और नसें खुली रह जाती हैं, जिससे तेज दर्द होता है। डॉक्टर की दी गई निर्देशों का पालन करके इसे आसानी से बचाया जा सकता है।
अक्ल दाढ़ निकलवाने के लंबे समय के फायदे
हालांकि सर्जरी के बाद कुछ दिनों की असुविधा होती है, लेकिन इसके दीर्घकालिक लाभ बहुत अधिक होते हैं:
- पुराने दर्द से मुक्ति: अक्ल दाढ़ के कारण होने वाला तेज दर्द, जो खाना खाने और बोलने में परेशान करता है, हमेशा के लिए खत्म हो जाता है।
- बार-बार होने वाले इन्फेक्शन से छुटकारा: ‘पेरिकोरोनाइटिस’ नामक बीमारी, जिसमें अक्ल दाढ़ के आस-पास के मसूड़े सूज जाते हैं, का खतरा पूरी तरह टल जाता है।
- कैविटी और पायोरिया का खतरा कम होना: दबी हुई अक्ल दाढ़ सामने वाले दांत (दूसरे मोलर) को साफ करने में दिक्कत पैदा करती है, जिससे वहां कैविटी और मसूड़ों की बीमारी लग जाती है। दांत निकलवाने से यह खतरा खत्म हो जाता है।
- दूसरे दांतों को नुकसान से बचाव: कभी-कभी इम्पैक्टेड दांत धीरे-धीरे सामने के दांतों की जड़ को नुकसान पहुंचाने लगता है।
- ओरल कैंसर का खतरा कम होना: सबसे महत्वपूर्ण बात, जब आप इस तरह के क्रोनिक इन्फेक्शन, सिस्ट और जलन के केंद्र को ही खत्म कर देते हैं, तो मुंह के कैंसर का अप्रत्यक्ष खतरा स्वतः ही शून्य के करीब पहुंच जाता है।
डॉक्टर्स की सलाह
अगर आपको भी मुंह के अंदरूनी हिस्से में दर्द, बार-बार सूजन आना, खुलते मुंह से बदबू आना, या गाल के अंदर किसी तेज हिस्से से लगातार रगड़ खाने की समस्या हो रही है, तो इसे नजरअंदाज न करें। एक अच्छे डेंटल एक्सपर्ट या ओरल सर्जन से मिलें और एक सिंपल एक्स-रे (OPG) कराएं। निदान और सही समय पर किया गया इलाज न सिर्फ आपके दर्द से राहत दिलाएगा, बल्कि भविष्य में होने वाली गंभीर बीमारियों से भी आपको सुरक्षित रखेगा। आपकी सेहत आपके हाथ में है, समझदारी (अक्ल) इसमें भी काम आएगी!
























