The Biological Mystery of Death Solved: जब किसी व्यक्ति की दिल की धड़कन रुक जाती है, तो उसे मृत घोषित कर दिया जाता है। आम धारणा के अनुसार, सांस और धड़कन रुकना ही मौत है। लेकिन क्या आपने कभी ये सोचा है कि आखिर इंसान मरता कैसे है? क्या सच में दिल की धड़कन रुकना मौत की असली वजह है? आधुनिक विज्ञान का जवाब है- नहीं! दिल और दिमाग बंद होना तो मौत का आखिरी पड़ाव है, असली मौत तो कई दशक पहले शरीर के सूक्ष्मतम स्तर पर शुरू हो जाती है।
विज्ञान ने मौत के पीछे छिपे इस जटिल बायोलॉजिकल राज से पर्दा उठा दिया है। आइए आपको बताते हैं वो असली सच, जो शरीर की कोशिकाओं और डीएनए से जुड़ा है।
क्लिनिकल मौत और असली मौत में अंतर
बता दें कि डॉक्टरों की भाषा में जब दिल की धड़कन और सांस रुक जाती है, तो उसे ‘क्लिनिकल डेथ’ कहते हैं। इसके कुछ मिनटों बाद दिमाग तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती और वो काम करना बंद कर देता है, जिसे ‘ब्रेन डेथ’ कहा जाता है। लेकिन विज्ञान के अनुसार, ये सिर्फ अंतिम चरण हैं। असली मौत की शुरुआत होती है तब, जब शरीर की कोशिकाएं ‘बूढ़ी’ होने लगती हैं। वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को ‘सेनेसेंस’ (Senescence) या बायोलॉजिकल एजिंग कहते हैं।
डीएनए का वो राज, जो तय करता है आपकी उम्र
हमारे शरीर के हर क्रोमोसोम के सिरे पर ‘टेलोमियर’ (Telomere) नाम के छोटे-छोटे प्रोटेक्टिव कैप (ढकन) होते हैं। आप इन्हें जूते के फीते के ऊपर लगे प्लास्टिक कैप की तरह समझ सकते हैं। ये टेलोमियर हमारे जेनेटिक कोड को खराब होने से बचाते हैं।
जब भी शरीर की कोशिकाएं डिवाइड (बँटती) हैं ताकि शरीर की मरम्मत हो सके, तब ये टेलोमियर थोड़ा-थोड़ा छोटा हो जाता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, ये कैप छोटा होता जाता है। एक समय ऐसा आता है जब ये इतना छोटा हो जाता है कि कोशिका और डिवाइड नहीं कर पाती।
हेफ्लिक लिमिट: कोशिकाओं की ‘एक्सपायरी डेट’
साल 1961 में वैज्ञानिक लियोनार्ड हेफ्लिक ने एक चौंकाने वाली खोज की। उन्होंने बताया कि एक इंसान की कोशिका जिंदगी में सिर्फ लगभग 50 बार ही बँट सकती है। इस सीमा को ‘हेफ्लिक लिमिट’ कहा गया। इस लिमिट पूरा होने के बाद कोशिकाएं ‘सेनेसेंट’ यानी बूढ़ी और निष्क्रिय हो जाती हैं।
ये बूढ़ी कोशिकाएं शरीर में जहर का काम करती हैं। ये सूजन (Inflammation) पैदा करती हैं और आसपास की स्वस्थ कोशिकाओं को भी खराब कर देती हैं। इसका असर सीधा अंगों पर पड़ता है और धीरे-धीरे दिल, किडनी, लीवर और दिमाग फेल होने लगते हैं। यही असली मौत है।
कैंसर कोशिकाएं क्यों होती हैं ‘अमर’?
अब सवाल उठता है कि क्या इस टेलोमियर को फिर से लंबा करके इंसान को अमर या बहुत लंबी उम्र वाला बनाया जा सकता है? विज्ञान के पास इसका जवाब है- ‘टेलोमरेज’ (Telomerase) नाम का एक एंजाइम टेलोमियर को फिर से लंबा कर सकता है। लेकिन यहां एक बड़ा खतरा छिपा है।
प्रकृति ने इस एंजाइम को सामान्य कोशिकाओं में बंद रखा है। क्यों? क्योंकि अगर ये एंजाइम सक्रिय हो जाए, तो कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बँटने लगेंगी और कभी नहीं मरेंगी। **और यही कैंसर है!** कैंसर कोशिकाएं ‘टेलोमरेज’ एंजाइम का इस्तेमाल करके ही ‘अमर’ हो जाती हैं, जो शरीर को तबाह करती हैं।
भविष्य में क्या संभव है?
तमामाचूहों पर किए गए प्रयोगों में वैज्ञानिकों ने ‘टेलोमरेज’ को कंट्रोल करके उनकी उम्र 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ा ली है। लेकिन इंसानों पर इसका इस्तेमाल अभी बहुत दूर की बात है। कैंसर के बढ़ते खतरे के कारण विज्ञान अभी इस एंजाइम को ‘बैलेंस’ करने का रास्ता खोज रहा है।























