मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत की बात की जा रही थी, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने इस कथन पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हाल में हुआ ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौता’ अपने शुरुआती दौर में ही एक कठिन लिटमस टेस्ट का सामना कर रहा है। ईरान के समर्थन से चलने वाले यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के जाजान स्थित अरामको रिफाइनरी पर ड्रोन हमले के बाद, इस नए गठबंधन की ताकत और तैयारी की पोल खुलती नजर आ रही है।
‘एक पर हमला, तीनों पर हमला’ का खोखला दावा
शुक्रवार को मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के बीच इस समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। इसे दुनिया भर में ‘इस्लामिक देशों का नाटो’ के नाम से प्रचारित किया गया था। इसकी सबसे बड़ी अहमियत इस दावे में निहित थी कि इन तीनों देशों में से किसी एक पर होने वाला कोई भी सशस्त्र हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा।
लेकिन नियत समय से पहले ही यह दावा धरा का धरा रह गया। समझौते पर दस्तखत होने के महज 48 घंटे के भीतर, रविवार की सुबह हूती विद्रोहियों ने जाजान की रिफाइनरी को अपना निशाना बनाया। हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सारी ने साफ किया कि यह कार्रवाई सऊदी अरब द्वारा सादा और हज्जाह प्रांतों में किए गए ड्रोन ऑपरेशनों का बदला थी। हालांकि सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने रिफाइनरी में लगी आग पर काबू पा लेने की पुष्टि की, लेकिन इस हमले के बाद जो खामोशी रखी गई, वह चौंकाने वाली थी।
अंकारा और इस्लामाबाद की अनसुनी चुप्पी
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक साझेदार देश पर सीधा हमला हुआ, तो बाकी दो देशों—तुर्की और पाकिस्तान ने इस पर कोई आक्रामक प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी? न तो किसी तरह की सैन्य जवाबी कार्रवाई का संकेत दिया गया और न ही हूती विद्रोहियों को कोई कड़ी चेतावनी दी गई। ‘जेरूशलम पोस्ट’ की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इस चुप्पी ने इस रक्षा गठब
























